Saturday, April 4, 2020

चमचेरिया हुआ

चमचेरिया हुआ 

अपने एक मित्र हैं फक्कड नाथ फक्कड, सुबह-सुबह ही हमारे घर पर आ धमके । मित्र होने के कारण उनका यह अधिकार तो बनता ही है कि वह कभी भी किसी भी समय हमारे घर आ धमके ।

आते ही कहने लगे, चलिये, भ्रमित जी, डाक्टर विश्वास से मिलने चलते हैं ।

मैंने उत्सुकतावश पूछा, क्या हुआ फक्कड जी, आज सुबह सुबह ही डाक्टर विश्वास की याद कैसे आ गयी ?

कहने लगे,  भ्रमित जी, माना, डाक्टर विश्वास पेशे से आखों के डाक्टर है लेकिन हमारे अच्छे मित्र भी हैं । काफी दिन हो गये, उनसे मुलाकात भी नहीं हुई । उनसे मिलने का मन कर रहा था, सोचा आपको भी साथ ले

चलू ?

मैंने भी उनकी हाँ मे हाँ मिला दी । इस तरह हम पहुंच गये डाक्टर विश्वास के पास ।

डाक्टर विश्वास,  उस समय कोई व्यस्त ना थे, इसलिए मिलने में कोई परेशानी नहीँ हुई 

हमें देखते ही, डाक्टर विश्वास तपाक से ब़ोले, आइये मित्रवर आइये,  फिर फक्कड जी को मुखातिब हो कर कहने लगे, फक्कड जी सब कुशल मंगल तो है? आज हमारी याद कैसे आ गई?

फक्कड जी कहने लगे, डाक्टर साहब, आज के जमाने में कुशल मंगल की बात करना तो अच्छा लगता है, लेकिन होता नहीं है ।

क्या आंख दिखाने आऐ हैं?

फक्कड जी कहने लगे, आंख दिखाना, डराना, धमकाना ?

क्या डाक्टर साहब आप हमसे ऐसी उम्मीद करते हैं ?

वैसे डराना धमकाना न तो हमारे बस की बात है और न हमारे सोच विचार में ।

तभी डाक्टर साहब के किलीनिक में एक मरीज ने कदम रखा ।

इसके बाद डाक्टर साहब मरीज से बात करने लगे । औऱ इस तरह बातचीत में रुकावट आ गई ।

डाक्टर साहब – बताइये आपको क्या तकलीफ है ?

डाक्टर साहब – लगता है कि मेरी नजर में खोट आ गया है?

मरीज की बात सुन कर डाक्टर विश्वास चकराए और सोचने लगे,  आमतौर पर मरीज अपनी परेशानी बताता है, जैसे कि पास की नजर कम है या दूर की नजर कम है या पूरी ही नजर कमजोर है । लेकिन नजर में खोट ?

फिर भी डाक्टर साहब ने मरीज की पूरी नजर टैस्ट की ।

फिर डाक्टर साहब ने कहा – आपकी तो नजर पूरी तरह से ठीक है । फिर समस्या कहाँ है?

मरीज कहने लगा – जी मुझे हर चीज अच्छी दिखाई देती है  । आप पेशे से डाक्टर हैं, मुझे इस पेशे में कुछ भी बुराई नहीं दिखाई देती । कुछ भी गलत नहीं दिखाई देता।


जैसे झोलाछाप डाक्टरों का डाक्टरी करना अच्छा नहीं माना जाता । लेकिन मुझे इस में कोई बुराई दिखाई नहीं देती । इतना ही नहीं, मुझे  किसी भी पेशे में मुझे कहीं कोई अनफेयर प्रैक्टिस नजर नहीं आती । जिसे आमतौर पर अनफेयर प्रैक्टिस माना जाता है ।

मरीज की बात सुन कर डाक्टर साहब गहरे सोच में डूब गये, फिर थोड़ी देर बाद,  मरीज से पूंछने लगे – अच्छा बताइये, आप कहाँ काम करते हैं ? आप के अपने बास के .साथ कैसे संबंध हैं? आप कितने समय से मौजूदा कंपनी में हैं ? आपकी कितने समय से तरक्की नहीं हुई है ? 

इतने सारे प्रश्न एक साथ पूंछने पर मरीज घबरा कर पूछने लगा – डाक्टर साहब मुझे हुआ क्या है ? 

डाक्टर विश्वास कहने लगे,  आप पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दीजिए फिर मैं आप को बताऊँगा कि आप को क्या हुआ है। 

मरीज कहने लगा, डाक्टर साहब,  मैं एक प्राइवेट कम्पनी बतौर एक एकाउन्टैंट काम करता हूँ । पिछले छः सात साल से काम कर रहा हूँ मैं एक सक्षम अधिकारी हूँ । लेकिन  तरक्की के मामले में जीरो हूँ । मेरे अपने बास के साथ संबंध सामान्य हैं, पर घनिष्ठ नहीं । मेरे से जूनियरों का प्रमोशन होता रहता है, पर मैं वहीं का वहीं पडा हूँ । मेरी तरक्की नहीँ होती । अब बताइए, डाक्टर साहब मुझे क्या हुआ है?

डाक्टर विश्वास कहने लगे – देखिये, मेरे विचार से आपको  चमचेरिया हुआ है ।

चमचेरिया ? क्या यह भी कोई बीमारी है ? 

डाक्टर साहब कहने लगे, हाँ यह भी एक किस्म की बीमारी है । जैसे मलेरिया होता है, लवेरिया होता है । उसी तरह से चमचेरिया होता है । यह रोग ज्यादातर कैरियर की दहलीज पर खडे व्यक्तियों को जल्दी होता है या तरह-तरह की ठोकर खाये व्यक्तियों को होता है । लेकिन यह कोई बाल रोग नहीं है । बालकाल में तो व्यक्ति कुछ खास ही किस्म का होता है, न पिटने का डर औजल्नहीं पीटने का । यह रोग उन व्यक्तियों को विशेषकर होता है जो अपने आशातीत सपनों को जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहते हैं । इसके अलावा इस में वे व्यक्ति भी शामिल हैँ जो अपनी खद्दारी से तंग आ चुके है और जल्द से जल्द सफलता की सीढियां चाहते है । आप में  भी मुझे चमचेरिया के लक्षण नजर आ रह हैं ।

अब क्या होगा? डाक्टर साहब, मरीज ने पूँछा ।

घबराने की कोई बात नहीं,  मुझे आप का भविष्य उज्जवल नजर आ रहा है । यह रोग न तो आप क़ो शारीरिक कष्ट पहुँचाएगा और न ही मानसिक । जब खद्दारी ही नहीं बचेगी, तो चमचेरिया आप का क्या बिगाडेगा ?

तभी मैंने फक्कड जी के कान में कहा, देखो, अपने डाक्टर विश्वास, हैं तो डाक्टर आँखों के और इलाज कर रहे हैं मानसिक रोग का ।

फक्कड जी ने मेरे कान में फसफुसाया, भ्रमित जी इसमें बुराई क्या है ? जब झोला छाप डाक्टर,  डाक्टरी कर सकते है । बगैर पढे किताब की व्याख्या जा सकती है ।

तो डाक्टर विश्वास आँखों के रोग के डाक्टर होते हुये मानसिक रोग का इलाज क्यों नहीं कर सकते ? आज किसी विषय पर व्याख्यान देने के लिए उस विषय विशेष का एक्सपर्ट होना लाजिमी तो नहीं है । क्या ऐसे विशेषज्ञ आप को ढूँढने से नहीं मिलेंगें ?

दूसरी तरफ डाक्टर विश्वास अपने मरीज क़ो समझा रहे थे कि आप अपने बास पर अपनी योग्यता एवं वफादारी की धाक कैसे जमा सकते  हैं । अच्छा बताइए, आप का अपने संग-साथियों के साथ कैसा संबंध है? 

मरीज ने कहा – मैं तो अपने सभी संग-साथियों के साथ हँस कर, प्यार से बात करता हूँ 

डाक्टर विश्वास कहने लगे- अगर आप अपनी सफलता की सीढियों में छलांग लगाना चाहते हैं तो कल से यह सब बंद । आप आगे से अपने सभी संग- साथियों के साथ गंभीरता से बातचीत करेंगे । वह भी टू दी पाइंट,  कोई हँसी मजाक नहीं । अपने और अपने संग-साथियों के बीच एक उचित दूरी बनाकर रखेंगे । लंच टाइम में अपना लंच नहीं करेंगें । आगे पीछे कभी भी करिये, अच्छा तो यही रहेगा कि सुबह-शाम भोजन की आदत डालिये । लंच टाइम या आफिस आवर्स के बाद, बास के आफिस या चैंबर के चक्कर काटिये, स्टाफ की चगली का कोई अवसर मत चूकिये । बात-बेबात बास से मिलने की कोशिश कीजिये और बास को यह अहसास कराने की कोशिश कीजिए कि आप बफादारी के मामले में किसी से कम नहीं हैं । हाँ आफिस में देर तक रुकने की आदत डालिये इससे आप को अपने बास से निकटता बना ने में मदद मिलेगी । पहले-पहल हो सकता है, बास आप की उपेक्षा करे । आप निराश मत होइये, आप लगे रहिए ।

देर- सवेर में, आप पर आपके बास का विश्वास जमेगा औऱ आप की प्रगति का दरवाजा खुल कर रहेगा ।

इतनी बात सुन कर मरीज, डाक्टर साहब को मार्ग दर्शन फीस की राशि दे कर चला गया।

इसके बाद फक्कड जी ने डाक्टर साहब से उनके इस तत्व ज्ञान की सार्थकता पर प्रश्न पछा तो डाक्टर साहब कहने लगे – मैंने जो सफलता का ज्ञान अपने मरीज को दिया है वह अपवाद से परे नहीं है ।

डाक्टर साहब की बात सुन कर, हम तो निरुत्तर हो गये । क्या आप भी ?

Wednesday, April 1, 2020

भविष्यवाणी का सच

भविष्यवाणी का सच

 हाल ही में, मेरे पास अनेक मित्रों के मैसेज आये. जिन में बताया गया कि आज हम जिस कोरोना वायरस बीमारी का दंश झेल रहे हैं. उसकी भविष्यवाणी तो दस हजार वर्ष पूर्व कर दी गयी थी. इसका उल्लेख नारद संहिता में है. कोई व्यक्ति दस हजार वर्ष आज की मौजूदा कोरोना वायरस बीमारी की भविष्यवाणी कैसे कर सकता है. यह बात मेरी समझ से बिलकुल परे है.
जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ. व्यक्ति की सोच, व्यक्ति के देश काल के सामजिक परिवेश की सीमाओं नहीं लांघ सकती. अगर ऐसा संभव होता, तो इतिहास में अन्य अनेक विद्वान एवं महान हस्तियां हुई है, उन सभी ने अपने समय काल की सामाजिक समस्याओं से जूझते हुए सामाजिक प्रगति में महान योगदान दिया है. लेकिन वे भी आधुनिक जगत की आवश्यकताओं के अनुरूप सोच को जन्म नहीं दे पायें है. यह काम आधुनिक काल के महान हस्तियों ने किया है.

उदाहरण के लिए देखिये, पूंजीवाद का जन्म शामंतवाद के मरणासन्न होने पर ही हुआ. जब वह सामाजिक प्रगति के साथ नहीं चल सकता था. तब ही पूंजीवादी सोच, जैसे व्यक्ति को केन्द्र बिंदु मान कर व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए व्यक्ति आजादी बोलने की, लिखने की, सेक्यूलरिज़्म का सिद्धांत - राजसत्ता का काम काज धर्म निरपेक्ष कै तरीके से चलाया जायेगा. सेक्युलर स्टेट का अपना कोई धर्म नहीं होगा. वह अपने नागरिकों को जाति, भाषा, धर्म, नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा. धर्म व्यक्ति की निजी आस्था का विषय होगा और राजनीति में धर्म की कोई जगह नहीं होगी.
इस प्रकार, व्यक्ति को जाति, भाषा धर्म, तथा नस्ल के आधार पर होने वाले भेदभाव से बचाया जा सके. सत्ता का विकेन्द्रीकरण, आदि. इन्ही जीवन मूल्यों को लेकर, शामन्तवाद को तोडते हुए पूंजीवाद अस्तित्व आया था. देखिए उन्हीं जीवन मूल्यों का, आज का पूंजीवाद साम्राज्यवाद, घोर शत्रु बना बैठा है.
स्पष्ट है, समय के साथ सत्य भी बदलता है. अत: दस हजार वर्ष पूर्व की भविष्यवाणी सच नहीं हो सकती. यह कुछ निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भ्रामक प्रचार है. जिस का उद्देश्य सामाजिक प्रगति के बारे में आम मेहनतकश आवाम को भ्रमित करना है.
मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि वह उन्नत से उन्नत स्थिति की ओर विकसित होता रहा है और होता रहेगा. इस में विलंब हो सकता है. लेकिन विकास का क्रम नहीं रुकेगा.


Friday, March 27, 2020

शिष्टाचार के संग्राम भीड़ तंत्र के बुद्धिजीवी तिकोना पार्क के बुद्धिजीवी मंच पर विचार मग्न थे। विमर्श का विषय था, शिष्टाचार के संग्राम। इस संबंध में सबसे पहले ज्ञान प्रकाश जी ने अपनी बात रखी जो इस प्रकार थी । देखिए, शिष्टाचार के संग्राम एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है जिस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिये। क्योंकि शिष्टाचार का सही पालन न होना भी, आये दिन नये नये किस्म के लड़ाई झगडों को जन्म देता है। सामान्य तौर पर शिष्टाचार के बारे में यही समझा जाता है कि बच्चे अपनों से बड़ों का सम्मान करें और बड़े अपनों से छोटों को स्नेह करें और उनका मार्गदर्शन करें । यह एक सामान्य समझ है । लेकिन साहब शिष्टाचार के बारे में समझने के लिए इतना ही जानना ही काफी नहीं है। अगर आप सरकारी एवं निजी सेवाओं पर नजर डालेंगे तो आप को इससे उलट देखने को मिलेगा। इन सेवाओं में उम्र व रिश्ते के आधार पर शिष्टाचार निभाने का चलन नहीं है। यहाँ पर तो कर्मचारियों के रैंक के आधार पर, कनिष्ठ अपने वरिष्ठ को सम्मान देते हैं और वरिष्ठ अपने कनिष्ठों का मार्गदर्शन करते हैं। इस आचारसंहिता का उल्लंघन करने पर कर्मचारी अनुशासन भंग का उत्तरदायी होता है । यह एक सामान्य नियम है । यहाँ पर भी सब ठीक नहीं चलता है । अपवाद के रूप में कनिष्ठ अपनी ऊंची पहुँच के बल पर अपने वरिष्ठ की अनदेखी करते हैं और वरिष्ठ अपनी र्दुभावना के चलते अपने कनिष्ठों का शोषण और दमन करते हैं । जो आये दिन, एक नए संग्राम को जन्म देते हैं। वैसे इस तरह की प्रवृतियों पर अंकुश लगाने के लिए, अनुशासन का डंडा, हमेशा शासन के पास रहता है। इसके अलावा, यह भी सुनने में आता है कि यहाँ पर भ्रष्टाचार भी एक शिष्टाचार के रुप में प्रतिष्ठित हो चुका है। घर परिवार में शिष्टाचार का आधार पारिवारिक रिश्ते हैं। जो अपने रिश्ते की हैसियत के अनुसार, व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। यानि कि जो रिश्ते में बडे समझे जाते हैं, वे सम्मान के अधिकारी है जो नहीं हैं वे स्नेह के पात्र हैं । लेकिन यहाँ पर भी सब कुछ ठीक नहीं रहता है। जो कमाते हैं वे सब पर हुक्म चलाते हैं। इसमें बडे - छोटे का कोई ख्याल नहीं रहता। इससे, सबसे ज्यादा आहत, वरिष्ठ नागरिक होते हैं। जो कभी, पहले इस घर के मुखिया थे। इस के अलावा जिस घर में एक से ज्यादा कमाने वाले हैं ,वहां घर में अपने वर्चस्व को लेकर को लेकर संघर्ष देखने को मिलता है । यह संघर्ष नित नये नये संग्रामों को जन्म देता रहता है। जैसा कि हम जानते हैं कि, परिवार भी समाज का अभिन्न अंग होने के नाते, अनेक सामाजिक संबंधों से जुडा होता है । यानि कि, अन्य अनेक परिवार, परिवार विशेष से जुडे होते हैं। लेकिन इन सामाजिक संबंधों में भी पारिवारिक संपन्नता और विपन्नता की झलक साफ दिखाई देती है। यह आर्थिक अंतर हमारे, सामाजिक संबंधों में विष घोलते रहते हैं। यानि कि, सामाजिक संबंध भी आर्थिक संपन्नता और विपन्नता के आधार पर वरीयता प्राप्त करते हैं। यह स्थिति भी शिष्टाचार के तानेबानेको अस्तव्यस्त करने में अपनी एक अहम भूमिका निभाती है तथा शिष्टाचार के नये -नये किस्म के संग्राम को जन्म देती हैं। इसके अलावा ऐसा भी देखने में आया है कि नये रिश्ते पुराने रिश्तों पर भारी पडते हैं। अर्थात नये रिश्ते, पुराने रिश्तों से अधिक वरीयता पाते हैं। जो कि शिष्टाचार के एक नये किस्म के संग्राम को जन्म देते हैं। राजनीति और व्यापार के अपने जटिल शिष्टाचार हैं । जो मूलत: लाभ हानि के गणित से संचालित होते है। उन पर भी चर्चा करेंगे तो विषय और भी जटिल तथा बोझिल हो जायेगा। वैसे शिष्टाचार के संग्राम यहाँ पर भी हैं। वक्तव्य समाप्त होने पर, पर गुप्ता जी ने पूछा, ज्ञान प्रकाश जी, यह जो आपने वस्तु स्थित बतायी है । वह तो एक ऐसी सच्चाई है जो हमारे घर परिवार का नाक में दम किये हुए हैं। क्या इस स्थिति में बेहतर कल की कोई संभावना है? बिल्कुल है, इसके लिए हमें शिष्टाचार के संग्राम के कारणों को ढूंढना होगा, तथा उनका वैज्ञानिक समाधान निकालना होगा। यह काम व्यापक सांस्कृतिक आन्दोलन के बिना संभव नहीं है।आम मेहनतकश की सोच को बदलना होगा। व्यक्ति - अहंकार, "बाप बड़ा न भईया, सबसे बड़ा रुपईया " की विनाशकारी सोच को दफनाना होगा और नये जीवन मूल्यबोधों, उच्च नीति नैतिकता आधारित संस्कृति को अपनाना होगा। इस प्रकार एक नये इंसान का निर्माण करते हुए एक नये जीवन आदर्श को अपनाना होगा। जो मानव द्वारा मानव के शोषण से मुक्ति दिलाने के संघर्ष में आम मेहनतकश जनता के लिए मार्ग-दर्शक माडल के रूप में काम करेगा। आप के विचार में, व्यक्ति का आत्मकेंद्रित चिन्तनयानि कि अपने काम से काम रखने की मानसिकता या यों कहें," मेरा काम सीधा भाड में जाय मजीदा" वाली सोच की क्या भूमिका है? देखिए, यह घोर व्यक्तिवादी एवं समाज विरोधी सोच है तथा संकटग्रस्त पूंजीवाद की प्रति छाया है,। ऐसा नहीं है कि व्यक्तिवाद हमेशा से ही ऐसा रहा है । एक समय यह उभरते हुए पूंजीवाद का सैद्धान्तिक संबल था जिसने नये प्रगतिशील जीवन मूल्य बोधों, जैसे सत्ता का विकेन्द्रीकरण, व्यक्ति स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, आदि सिद्धांतों का सूत्रपात किया था। जिसने मानव सभ्यता के विकास में असीम योगदान दिया है। लेकिन अब जब पूंजीवाद घनघोर बाजार संकट से जूझते हुए मोरीबन्द हो गया है । ऐसी स्थित में आज का व्यक्तिवाद सामूहिक सोच तथा सामूहिक हित के विरुद्ध कार्य करने को विवश है। अत: ऐसी सोच का परित्याग करना ही उचित है क्योंकि यह अंततः व्यक्ति को अकेलेपन की ओर धकेलती है। जिसका परिणाम यह होता है कि वह अवसाद का शिकार हो जाता है। समय की पुकार है कि हम व्यक्ति,समाज की प्रगति के लिए वैज्ञानिक,धर्मनिरपेक्ष एवं सामूहिक सोच को अपने जीवन में लागू करें और व्यक्ति समाज की प्रगति में अपनी भागेदारी सुनिश्चित करें ।

Wednesday, October 25, 2017

अक्ल बचत के फायदे

अक्ल बचत के फायदे

देखिये साहब, आपने अन्य अनेक किस्म की बचत योजनाओं के बारे में सुना होगा। क्या आपने कभी अक्ल बचत के बारे में सुना है ? नहीं न ? तो आइये हम आपको अपने एक मित्र फक्कड़ नाथ फक्कड से मिलवाते हैं । वह बतायेंगे आपको इसके फायदे । लीजिये सुनिये हमारी बातचीत -
फक्कड जी आपने अक्ल बचत योजना पर काम करना शुरू कर दिया है । क्या यह योजना प्रतिष्ठित मान्यता –“ ज्ञान बाँटने से ज्ञान बढता है” के विरुद्ध नहीं है?
 भ्रमित जी, अगर यही एकमात्र सत्य होता तो कंसल्टेंसी बिजनेस का भविष्य? कंसल्टेंसी बिजनेस का बढता दायरा भी कुछ संकेत करता है ।
तब क्या आप यह कहना चाहते हैं ? कि यह एकमात्र सत्य नहीं है ।
सत्य तो यही है ।
 अच्छा, आप बताइए आपकी अक्ल बचत योजना से आम जनमानस को क्या लाभ हैं ?
म्रमित जी आप बास नाम के जीव के बारे में तो जानते ही होंगे । यह जीव सर्वव्यापी है, यह घर आफिस सभी जगह मौजूद है । यह अकेला नहीं है । इसकी भी मल्टी लेवल चेन है । यह आवश्यक नहीं है कि जो महाशय आफिस में कड़क आफीसर हैं वह घर में भी अपनी आफीसरी प्रतिष्ठा बनाए रखें हों । यानि, कि घर में कड़क आफीसर के बजाय म्याऊँ बने हुए न होँ । अतः स्पष्ट है कि, आप का इन महान विभूतियों के बीच कार्य करना कोई हँसी खेल नहीं है । अगर आप  इन विभूतियों के बीच अपनी सृजनशील बुद्धि का इस्तेमाल करेंगे तो आप पर आये दिन मुशीबत आती जाती रहेगी । इसलिए इस मामले में अक्ल बचत का फार्मूला आपकी काफी मदद कर सकता है ।
अगर आप सृजनशील नागरिक हैं और किसी निजी या सरकारी आफिस में काम करते हैं तो यह अक्ल बचत योजना आपके लिए बड़े काम की है । आप बस, अपने बास की अकल की योजना को अमलीजामा पहनाइऐ और सुखी रहिये । यानि कि बास की योजना को अपनी सृजनशील बुध्दि के बिना लागू कीजिए । आपका सृजनशील योगदान सफलता की स्थिति में आप की वाहवाही का कारण तो बनेगा  लेकिन जरा सी चूक में आप पर मुशीबत का पहाड़ भी टूट पड़ेगा । अतः उचित यही है कि आप अक्ल बचत योजना को अपने जीवन में अपनाएं । जितनी योग्यता से आप इसे अपनी निजी जीवन में लागू करेंगे, यह उतनी ही तेजी से यह आपकी सफलता का राज भी बनेगी ।
अगर आप वरिष्ठ नागरिक हैं तो यह योजना आपके लिए बहुत ही काम की है । वरिष्ठ नागरिकों की,  मेरे विचार में एक बड़ी समस्या अपना ज्ञान बाँटने की होती है जिसको सुनने वाला कोई नहीं होता। यह समस्या अन्य अनेक समस्याएं खडी करती रहती है। इसके अलावा ये सज्जन पूर्व में बास रहे हैं और ऊँची आवाज में बोलने के आदी हैं । बदली हुई परिस्थिति में उन्हें ऊँची आवाज में नहीं धीमी आवाज़ में बोलना है । यह स्थिति उन्हें तनाव व कुंठा की ओर ले जाती है । लेकिन वे हैं कि अपनी आदत से बाज नहीं आते । इसके अलावा उनका अकेलापन उनको काटने को दौडता है । बात बे बात उनकी हर  सलाह उनको अप्रसांगिक साबित करती रहती हैं । जो उन्हें हताशा की ओर धकेलती है ।
 यह योजना उनके लिए भी बड़ी लाभकारी है जो कि    हाँ जी हाँ जी प्रवृत्ति के लिये जाने जाते हैं ।
लेकिन सृजनशील व्यक्तियों के लिए इस योजना का क्या लाभ है ?
देखिए भ्रमित जी यह योजना सबका साथ सबका विकास योजना का हिस्सा नहीं है ।
अच्छा, फक्कड जी आप वरिष्ठ नागरिकों के लिए इस योजना के लाभ के बारे में कुछ और बताइयेंगे ।
देखिये भ्रमित जी वरिष्ठ नागरिक पूर्व में बास थे जो अब सत्ताच्युत हो चुके हैं और घर में ही एकांत जीवन बिता रहे हैं । वे घर के संपूर्ण घटना क्रम पर नजर रखते हैं । कुछ भी गलत दिखाई देने पर अपनी राय देने से नहीं चूकते । जिसके कारण उन्हें अक्सर अपमानित तक होना पड़ता है । ऐसे अपमान से बचने में उनका मौन व्रत काफी सहायक हो सकता है । यानि कि अक्ल बचत योजना ।
क्या यह आदर्श स्थिति है ?
नहीं बिल्कुल नहीं । लेकिन यह मौजूदा समय का कठ़ोर सत्य है ।
क्या इसका कोई विकल्प नहीं ।
है क्यों नहीं । लेकिन वह खोज का विषय है । आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाइये और इस तरह की समस्याओं का ड़ट कर मुकाबला करें ।

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Sunday, October 22, 2017

कसक

कसक
अमीना ने जैसे ही दरवाजा खोला, देखा कि सामने से मेधावी चली आ रही है ।
सुबह – सुबह किधर जाया जा रहा है ? पास आने पर अमीना ने मेधावी से पूछा ।
अरी ! अमीना तुझ से ही मिलने आ रही हूँ ।
तो फिर आ अन्दर, बैठ कर बात करते हैं ।
इसके बाद दोनों सहेलियां कमरे के अन्दर बैठ कर बातें करने लगीं ।
अमीना ने पूछा -आजकल तेरी बंगला काल़ोनी का क्या हाल है ?
मेधावी ने ठंडी आह भरी ! और फिर कहने लगी अब हमारी बंगला कालोनी कहाँ रही ? कभी यह बंगला कालोनी हुआ करती थी, जब यहाँ पर कोठी बंगले हुआ करते थे । अब तो यहाँ पर,  बस फ्लैट ही फ्लैट नजर आते हैं । अब इसे फ्लैट कालोनी कहो तो ज्यादा अच्छा है ।
सब वक्त की बात है,  वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता,  अमीना ने कहा ।
वह तो मै देख ही रही हूँ ! वक्त इतना तेजी से बदल जाता है, पता न था ? मेधावी ने कहा ।
और क्या बदल गया ? अमीना ने पूछा
 अब यह भी कोई बताने की बात  है ? मै एक घंटे से बक – बक किये जा रही  हूँ  और एक तू है कि  न तो चाय को पूछती है और न ही पानी क़ो ! मेधावी की बात सुन कर ,  अमीना शर्मिंन्दा होते हुए बोल उठी ! हाय राम ! म़ैं भी कितनी बाबली हूँ ? कि चाय – पानी तक पिलाना भूल गयी ?  मैं अभी आती हूँ , तू बैठ, कह कर झट से किचन में पानी  लेने चली गयी । जैसे ही अमीना पानी लेकर आयी
मेधावी ने अमीना से कहा – अमीना बैठ, तुझ से जरूरी बात करनी है ।
 ना बाबा न ! अब मैं पहले वाली गलती नहीं करने वाली । पहले तू चाय पी, फिर आगे बात होगी ।
चाय नाश्ता करने के बाद अमीना ने पूछा – अब बता,  मेधा्वी क्या बात करनी है ?
मेधा्वी ने पूछा – सच बता ! अमीना क्या तू जन्म से मुसलमान है या शादी के बाद मुसलमान बनी
है ?
मैं त़ो जन्म से ही मुसलमान हूँ । मेरी अम्मी और अब्बा पास की ही कालोनी में रहते हैं । पर तू मुझ से यह सब आज क्यों पूछ रही है । पहले तो कभी भी, आज तक यह सवाल नहीं पूछा ? फिर आज क्यों ?
सच कहूँ ! बुरा तो नहीं मानेगी ? तू जन्म से मुसलमान है ही नहीं ।
तो पंडित जी ! आपने मेरा हाथ देख कर जाना है आपने ?
नहीं ! तू तो बुरा मान गयी । चल छोड, नहीं बताना चाहती तो मत बता ! कोई बात नहीं ।
बात है । तूने यह बात मेरे बारे में कैसे कही ?
अमीना सच कडवा ह़ोता है । कभी कभी बहुत चुभने वाला भी । लेकिन सच त़ो सच ही होता है । जानना चाहती है कि यह सच मैने कैसे जाना तो सुन । इन्सान जब सोच समझ कर बोलता है तो वह कोई गलती नहीं करता । लेकिन जब वह आवेग में, भावावेश में या उल्लास में ब़़ोलता है तो वह बात भी बोल जाता है जो उसके अतीत की झलक दिखला जाता है । तुम्हारे साथ भी आज यही हुआ ।
मैं समझी नहीं मेधावी ! तुम क्या कह रही हो ? मैने आज ऐसा क्या कहा ?
अरे पगली “हाय राम” का प्रयोग क्या कोई मुसलमान करता है ?
इतना सुन कर अमीना गुम सुम सी हो गयी । फिर थोडी देर बाद बोली – मेधावी तुम सच में मेधावी  ह़ो । तुम केवल नाम से ही मेधावी नहीं हो, बल्कि अक्ल से भी मेधावी हो । जो बात पिछले दस साल से कोई न जान सका, वह तुमने इतनी आसानी से जान ली ।
अमीना मैं तुम्हारी अच्छी सहेली हूँ । क्या अब भी तुम अपने दिल की बात नहीं बताओगी ?
मेधावी बताऊँगी ! तुम्हें तो जरूर बताऊँगी ।
इसके बाद, अमीना कहने लगी – मेधावी तेरी बात सच है कि मैं जन्म से मुसलमान नहीं हूँ । मैंने शादी के बाद ही इस्लाम धर्म कबूल किया । मैं तो माथुर परिवार से थी । हमारा मध्यंमवर्गीय परिवार था । मैं चार भाई बहनों में सबसे छोटी थी । परिवार में छोटी होने के कारण सबकी लाडली भी
 थी । लेकिन आज उन सब से दूर एक बेगानी सी पडी हूँ । मेरी जिंदगी में यह बदलाव तब आया
 जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज से बी. काम कर रही थी । उसी कालेज में साहिल के पापा भी पढते थे । एक दिन कालेज लायब्रेरी में उनसे मुलाकात क्या हुई कि फिर हम आये दिन मिलने लगे । यह सिलसिला इतना बढा कि आखिर हमने शादी करने का फैसला कर लिया ।
इसके बाद जो होना था, वही हुआ । शब्बीर का परिवार इसके लिए रजामंद न था । जहाँ तक मेरे माँ – बाप की बात है वे भी इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे । लेकिन हमारे बुलंद इरादों के आगे किसी की एक न चली ।
नतीजा यह हुआ कि शब्बीर के परिवार वालों ने तो हमारे रिश्ते को कबूल कर लिया । लेकिन मेरे माँ – बाप ने मुझ से अपना रिश्ता हमेशा – हमेशा के लिए तोड़ दिया । वो दिन है और आज का दिन है, उन्होंने पीछे मुडकर आजतक नहीं देखा कि मैं जिंदा हूँ या नहीं । रिश्ते टूटने की कसक क्या होती है,  वह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है । हम उनमे से हैं  जो आज भी उन रिश्तों को याद कर तडपते हैं ।
यह कह कर अमीना फफक – फफक रो पडी ।
मेधावी उसके आँसू पोंछने की कोशिश रही थी लेकिन आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे
थे ।






Sunday, August 13, 2017

बात गौडफादर की ---

बात गौडफादर की ---
धन्य हैं वे ! आये बतियाए और चले गए । ऐसा ही कुछ बडबडा रहे थे । अचानक अपने पड़ोसी एवम् मित्र चरनदास जी पधार गये । आते ही पूछने लगे, कौन आया, बतियाया और चला गया ?
और हमारी बोलती बंद !
चरनदास जी कहने लगे भ्रमित जी कुछ बोलेंगे भी?
कौन आया बतियाया और चला गया ?
मैंने कहा – छोडिये चरनदास जी यह सब तो चलता रहता है । कोई खास बात नहीं ।
देखिये, भ्रमित जी यह अच्छी बात नहीं हैं? आप हमारे अच्छे मित्र हैं, पडोसी हैं फिर भी आप हम से कुछ छिपा रहे हैं । अगर छिपाना ही था तो आप इसका जिक्र हमारे सामने करते ही नहीं । जब जिक्र किया है तो बताइये भी ।
जब चरनदास जी ने अपनी बात इस तरह अधिकारपूर्वक कही तो मैं भी सोच में पड़ गया कि चरनदास जी को क्या बताऊँ । बात तो कुछ भी नहीं है जिसे बताया जाय । लेखक तो अपने कल्पना जगत विचरण करता ही रहता है । विचरण करते करते कभी वह मुस्कराता है, कभी यकायक हँस पड़ता है । क्या ये बातें किसी को बताने की होतीं
हैं । हर्गिज नहीं ।
मैंने चरनदास जी से विनम्रतापूर्वक कहा कि बात तो ऐसी कुछ भी नहीं है । मेरी आज गौडफादर से मुलाकात हुई है वो भी --- । उन्होंने मेरी बात पूरी तरह से सुनी भी नहीं और कहने लगे क्या कहा ? गौडफादर से --- आपकी बात हुई है । और चरनदास जी का मुंह, खुला का खुला रह गया
सच! अरे भ्रमित जी आप तो बड़े काम के आदमी
 हैं । हमें तो पता ही न था । अरे म्रमित जी गौडफादर की तलाश में तो लोगों की जिंदगियां गुजर जातीं हैं और उन्हें गौडफादर की शक्ल देखना तक नसीब नहीं होता । एक आप हैं कि आपने गौडफादर से बात कर ली । गौडफादर जिनके सिर पर अपना हाथ रख दें उनकी जिंदगी तो रातोंरात बदल जाती
है । जिन्हें कल तक कोई न पूछता हो उनके आगे फन्ने खाँ से फन्ने खाँ भी सिर झुकाते हैं । ऐसे लोगों की हर जगह, चाहे राजनीति हो या बिजनेस सभी जगह बल्ले- बल्ले होती है ।
एक तरफ चरनदास जी गौडफादर की महिमामंडन में लीन थे तो दूसरी तरफ़ मैं पसीने – पसीने हो रहा था । इतना नरवस हो रहा था कि अब गिरा कि तब गिरा ।
मेरी हालत देख कर चरनदास जी भावुकता की दुनिया स बाहर आ गये और मुझ से पूछने लगे क्या हुआ भ्रमित जी, आपकी तबीयत तो ठीक है ?
मैने कहा – हाँ सब ठीक है ।
अच्छा भ्रमित जी बताइये आपकी गौडफादर से क्या – क्या बात हुईं ? वह देखने में कैसे हैं ?
मैंने कहा – ठाटबाट वाले हैं । इसके बाद मैने गौडफादर के साथ हुई बातचीत का विवरण कुछ इस प्रकार दिया ।
मैने पूछा – प्रभु आप जिसके सिर पर हाथ रख देते हैं, वह सफलता की मंजिलें चूमने लगता है ।
वह बोले – हाँ यह सब तो है । इसलिए तो आजकल सफलता की लालसा लिए व्यक्ति मेरी तलाश में रहता है ।
प्रभु आप किस पर कृपा करते हैं ?
जो विश्वस्नीय हो, काम का हो योग्य हो । वैसे हर गुणवान होता है । आवश्यकता उसके गुणों को विकसित करने की होती है । र्पयाप्त साधन एवम् अवसर मिलें तो वह सफलता की मंजिलें चूमने लगता है ।
और कोई प्रश्न वत्स ?
प्रभु गौडफादर से आशीर्वाद पाने के लिए क्या किया जाय ?
गौडफादर और भक्त दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत रहती है । यह सतत खोज अभियान है ।
अच्छा शुभरात्रि वत्स ।
इतना कह कर गौडफादर चले गए और मैं अपने बिस्तर पर छटपटाता ही रह गया ।
क्या---? गौडफादर से मिलने की बात एक सपना थी?
मैने सकपकाते हुए कहा – हाँ चरनदास जी यही सच है । इसके बाद वह तमतमाते हुए चल दिए । मुझे उनके गुस्से के वे शब्द आज भी याद हैं कैसे कैसे लोग इस दुनिया में हैं । सारा टाइम खराब कर
 दिया । इन लेखकों के साथ यही समस्या है । ये वास्तविकता में कम ख्याली दुनिया में ज्यादा रहते हैं ।



Sunday, June 18, 2017

On Father's Day

   
On 14th May, we celebrated Mother's Day and today on 18th
June , we are celebrating Father's Day. Does it not seem to be
ritualistic way to celebrate all these important days?. Will this
way serve any social purpose? It  is a well established fact, that the role of Mother and Father play a very crucial in the process of development of children. They are the guardians of new generation. So, being a guardian, it becomes the bounded duty to prove to be a good role model before their children and hence provide them right guidance to be a good human being.

But what we are witnessing, we feel least concern for good human values. That's why we use to listen from the people that family values are on the decay? If we want to change this situation, then we have to think it over very seriously. Otherwise

Such celebration prove to be fruitless.