Wednesday, October 25, 2017

अक्ल बचत के फायदे

अक्ल बचत के फायदे

देखिये साहब, आपने अन्य अनेक किस्म की बचत योजनाओं के बारे में सुना होगा। क्या आपने कभी अक्ल बचत के बारे में सुना है ? नहीं न ? तो आइये हम आपको अपने एक मित्र फक्कड़ नाथ फक्कड से मिलवाते हैं । वह बतायेंगे आपको इसके फायदे । लीजिये सुनिये हमारी बातचीत -
फक्कड जी आपने अक्ल बचत योजना पर काम करना शुरू कर दिया है । क्या यह योजना प्रतिष्ठित मान्यता –“ ज्ञान बाँटने से ज्ञान बढता है” के विरुद्ध नहीं है?
 भ्रमित जी, अगर यही एकमात्र सत्य होता तो कंसल्टेंसी बिजनेस का भविष्य? कंसल्टेंसी बिजनेस का बढता दायरा भी कुछ संकेत करता है ।
तब क्या आप यह कहना चाहते हैं ? कि यह एकमात्र सत्य नहीं है ।
सत्य तो यही है ।
 अच्छा, आप बताइए आपकी अक्ल बचत योजना से आम जनमानस को क्या लाभ हैं ?
म्रमित जी आप बास नाम के जीव के बारे में तो जानते ही होंगे । यह जीव सर्वव्यापी है, यह घर आफिस सभी जगह मौजूद है । यह अकेला नहीं है । इसकी भी मल्टी लेवल चेन है । यह आवश्यक नहीं है कि जो महाशय आफिस में कड़क आफीसर हैं वह घर में भी अपनी आफीसरी प्रतिष्ठा बनाए रखें हों । यानि, कि घर में कड़क आफीसर के बजाय म्याऊँ बने हुए न होँ । अतः स्पष्ट है कि, आप का इन महान विभूतियों के बीच कार्य करना कोई हँसी खेल नहीं है । अगर आप  इन विभूतियों के बीच अपनी सृजनशील बुद्धि का इस्तेमाल करेंगे तो आप पर आये दिन मुशीबत आती जाती रहेगी । इसलिए इस मामले में अक्ल बचत का फार्मूला आपकी काफी मदद कर सकता है ।
अगर आप सृजनशील नागरिक हैं और किसी निजी या सरकारी आफिस में काम करते हैं तो यह अक्ल बचत योजना आपके लिए बड़े काम की है । आप बस, अपने बास की अकल की योजना को अमलीजामा पहनाइऐ और सुखी रहिये । यानि कि बास की योजना को अपनी सृजनशील बुध्दि के बिना लागू कीजिए । आपका सृजनशील योगदान सफलता की स्थिति में आप की वाहवाही का कारण तो बनेगा  लेकिन जरा सी चूक में आप पर मुशीबत का पहाड़ भी टूट पड़ेगा । अतः उचित यही है कि आप अक्ल बचत योजना को अपने जीवन में अपनाएं । जितनी योग्यता से आप इसे अपनी निजी जीवन में लागू करेंगे, यह उतनी ही तेजी से यह आपकी सफलता का राज भी बनेगी ।
अगर आप वरिष्ठ नागरिक हैं तो यह योजना आपके लिए बहुत ही काम की है । वरिष्ठ नागरिकों की,  मेरे विचार में एक बड़ी समस्या अपना ज्ञान बाँटने की होती है जिसको सुनने वाला कोई नहीं होता। यह समस्या अन्य अनेक समस्याएं खडी करती रहती है। इसके अलावा ये सज्जन पूर्व में बास रहे हैं और ऊँची आवाज में बोलने के आदी हैं । बदली हुई परिस्थिति में उन्हें ऊँची आवाज में नहीं धीमी आवाज़ में बोलना है । यह स्थिति उन्हें तनाव व कुंठा की ओर ले जाती है । लेकिन वे हैं कि अपनी आदत से बाज नहीं आते । इसके अलावा उनका अकेलापन उनको काटने को दौडता है । बात बे बात उनकी हर  सलाह उनको अप्रसांगिक साबित करती रहती हैं । जो उन्हें हताशा की ओर धकेलती है ।
 यह योजना उनके लिए भी बड़ी लाभकारी है जो कि    हाँ जी हाँ जी प्रवृत्ति के लिये जाने जाते हैं ।
लेकिन सृजनशील व्यक्तियों के लिए इस योजना का क्या लाभ है ?
देखिए भ्रमित जी यह योजना सबका साथ सबका विकास योजना का हिस्सा नहीं है ।
अच्छा, फक्कड जी आप वरिष्ठ नागरिकों के लिए इस योजना के लाभ के बारे में कुछ और बताइयेंगे ।
देखिये भ्रमित जी वरिष्ठ नागरिक पूर्व में बास थे जो अब सत्ताच्युत हो चुके हैं और घर में ही एकांत जीवन बिता रहे हैं । वे घर के संपूर्ण घटना क्रम पर नजर रखते हैं । कुछ भी गलत दिखाई देने पर अपनी राय देने से नहीं चूकते । जिसके कारण उन्हें अक्सर अपमानित तक होना पड़ता है । ऐसे अपमान से बचने में उनका मौन व्रत काफी सहायक हो सकता है । यानि कि अक्ल बचत योजना ।
क्या यह आदर्श स्थिति है ?
नहीं बिल्कुल नहीं । लेकिन यह मौजूदा समय का कठ़ोर सत्य है ।
क्या इसका कोई विकल्प नहीं ।
है क्यों नहीं । लेकिन वह खोज का विषय है । आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाइये और इस तरह की समस्याओं का ड़ट कर मुकाबला करें ।

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Sunday, October 22, 2017

कसक

कसक
अमीना ने जैसे ही दरवाजा खोला, देखा कि सामने से मेधावी चली आ रही है ।
सुबह – सुबह किधर जाया जा रहा है ? पास आने पर अमीना ने मेधावी से पूछा ।
अरी ! अमीना तुझ से ही मिलने आ रही हूँ ।
तो फिर आ अन्दर, बैठ कर बात करते हैं ।
इसके बाद दोनों सहेलियां कमरे के अन्दर बैठ कर बातें करने लगीं ।
अमीना ने पूछा -आजकल तेरी बंगला काल़ोनी का क्या हाल है ?
मेधावी ने ठंडी आह भरी ! और फिर कहने लगी अब हमारी बंगला कालोनी कहाँ रही ? कभी यह बंगला कालोनी हुआ करती थी, जब यहाँ पर कोठी बंगले हुआ करते थे । अब तो यहाँ पर,  बस फ्लैट ही फ्लैट नजर आते हैं । अब इसे फ्लैट कालोनी कहो तो ज्यादा अच्छा है ।
सब वक्त की बात है,  वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता,  अमीना ने कहा ।
वह तो मै देख ही रही हूँ ! वक्त इतना तेजी से बदल जाता है, पता न था ? मेधावी ने कहा ।
और क्या बदल गया ? अमीना ने पूछा
 अब यह भी कोई बताने की बात  है ? मै एक घंटे से बक – बक किये जा रही  हूँ  और एक तू है कि  न तो चाय को पूछती है और न ही पानी क़ो ! मेधावी की बात सुन कर ,  अमीना शर्मिंन्दा होते हुए बोल उठी ! हाय राम ! म़ैं भी कितनी बाबली हूँ ? कि चाय – पानी तक पिलाना भूल गयी ?  मैं अभी आती हूँ , तू बैठ, कह कर झट से किचन में पानी  लेने चली गयी । जैसे ही अमीना पानी लेकर आयी
मेधावी ने अमीना से कहा – अमीना बैठ, तुझ से जरूरी बात करनी है ।
 ना बाबा न ! अब मैं पहले वाली गलती नहीं करने वाली । पहले तू चाय पी, फिर आगे बात होगी ।
चाय नाश्ता करने के बाद अमीना ने पूछा – अब बता,  मेधा्वी क्या बात करनी है ?
मेधा्वी ने पूछा – सच बता ! अमीना क्या तू जन्म से मुसलमान है या शादी के बाद मुसलमान बनी
है ?
मैं त़ो जन्म से ही मुसलमान हूँ । मेरी अम्मी और अब्बा पास की ही कालोनी में रहते हैं । पर तू मुझ से यह सब आज क्यों पूछ रही है । पहले तो कभी भी, आज तक यह सवाल नहीं पूछा ? फिर आज क्यों ?
सच कहूँ ! बुरा तो नहीं मानेगी ? तू जन्म से मुसलमान है ही नहीं ।
तो पंडित जी ! आपने मेरा हाथ देख कर जाना है आपने ?
नहीं ! तू तो बुरा मान गयी । चल छोड, नहीं बताना चाहती तो मत बता ! कोई बात नहीं ।
बात है । तूने यह बात मेरे बारे में कैसे कही ?
अमीना सच कडवा ह़ोता है । कभी कभी बहुत चुभने वाला भी । लेकिन सच त़ो सच ही होता है । जानना चाहती है कि यह सच मैने कैसे जाना तो सुन । इन्सान जब सोच समझ कर बोलता है तो वह कोई गलती नहीं करता । लेकिन जब वह आवेग में, भावावेश में या उल्लास में ब़़ोलता है तो वह बात भी बोल जाता है जो उसके अतीत की झलक दिखला जाता है । तुम्हारे साथ भी आज यही हुआ ।
मैं समझी नहीं मेधावी ! तुम क्या कह रही हो ? मैने आज ऐसा क्या कहा ?
अरे पगली “हाय राम” का प्रयोग क्या कोई मुसलमान करता है ?
इतना सुन कर अमीना गुम सुम सी हो गयी । फिर थोडी देर बाद बोली – मेधावी तुम सच में मेधावी  ह़ो । तुम केवल नाम से ही मेधावी नहीं हो, बल्कि अक्ल से भी मेधावी हो । जो बात पिछले दस साल से कोई न जान सका, वह तुमने इतनी आसानी से जान ली ।
अमीना मैं तुम्हारी अच्छी सहेली हूँ । क्या अब भी तुम अपने दिल की बात नहीं बताओगी ?
मेधावी बताऊँगी ! तुम्हें तो जरूर बताऊँगी ।
इसके बाद, अमीना कहने लगी – मेधावी तेरी बात सच है कि मैं जन्म से मुसलमान नहीं हूँ । मैंने शादी के बाद ही इस्लाम धर्म कबूल किया । मैं तो माथुर परिवार से थी । हमारा मध्यंमवर्गीय परिवार था । मैं चार भाई बहनों में सबसे छोटी थी । परिवार में छोटी होने के कारण सबकी लाडली भी
 थी । लेकिन आज उन सब से दूर एक बेगानी सी पडी हूँ । मेरी जिंदगी में यह बदलाव तब आया
 जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज से बी. काम कर रही थी । उसी कालेज में साहिल के पापा भी पढते थे । एक दिन कालेज लायब्रेरी में उनसे मुलाकात क्या हुई कि फिर हम आये दिन मिलने लगे । यह सिलसिला इतना बढा कि आखिर हमने शादी करने का फैसला कर लिया ।
इसके बाद जो होना था, वही हुआ । शब्बीर का परिवार इसके लिए रजामंद न था । जहाँ तक मेरे माँ – बाप की बात है वे भी इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे । लेकिन हमारे बुलंद इरादों के आगे किसी की एक न चली ।
नतीजा यह हुआ कि शब्बीर के परिवार वालों ने तो हमारे रिश्ते को कबूल कर लिया । लेकिन मेरे माँ – बाप ने मुझ से अपना रिश्ता हमेशा – हमेशा के लिए तोड़ दिया । वो दिन है और आज का दिन है, उन्होंने पीछे मुडकर आजतक नहीं देखा कि मैं जिंदा हूँ या नहीं । रिश्ते टूटने की कसक क्या होती है,  वह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है । हम उनमे से हैं  जो आज भी उन रिश्तों को याद कर तडपते हैं ।
यह कह कर अमीना फफक – फफक रो पडी ।
मेधावी उसके आँसू पोंछने की कोशिश रही थी लेकिन आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे
थे ।






Sunday, August 13, 2017

बात गौडफादर की ---

बात गौडफादर की ---
धन्य हैं वे ! आये बतियाए और चले गए । ऐसा ही कुछ बडबडा रहे थे । अचानक अपने पड़ोसी एवम् मित्र चरनदास जी पधार गये । आते ही पूछने लगे, कौन आया, बतियाया और चला गया ?
और हमारी बोलती बंद !
चरनदास जी कहने लगे भ्रमित जी कुछ बोलेंगे भी?
कौन आया बतियाया और चला गया ?
मैंने कहा – छोडिये चरनदास जी यह सब तो चलता रहता है । कोई खास बात नहीं ।
देखिये, भ्रमित जी यह अच्छी बात नहीं हैं? आप हमारे अच्छे मित्र हैं, पडोसी हैं फिर भी आप हम से कुछ छिपा रहे हैं । अगर छिपाना ही था तो आप इसका जिक्र हमारे सामने करते ही नहीं । जब जिक्र किया है तो बताइये भी ।
जब चरनदास जी ने अपनी बात इस तरह अधिकारपूर्वक कही तो मैं भी सोच में पड़ गया कि चरनदास जी को क्या बताऊँ । बात तो कुछ भी नहीं है जिसे बताया जाय । लेखक तो अपने कल्पना जगत विचरण करता ही रहता है । विचरण करते करते कभी वह मुस्कराता है, कभी यकायक हँस पड़ता है । क्या ये बातें किसी को बताने की होतीं
हैं । हर्गिज नहीं ।
मैंने चरनदास जी से विनम्रतापूर्वक कहा कि बात तो ऐसी कुछ भी नहीं है । मेरी आज गौडफादर से मुलाकात हुई है वो भी --- । उन्होंने मेरी बात पूरी तरह से सुनी भी नहीं और कहने लगे क्या कहा ? गौडफादर से --- आपकी बात हुई है । और चरनदास जी का मुंह, खुला का खुला रह गया
सच! अरे भ्रमित जी आप तो बड़े काम के आदमी
 हैं । हमें तो पता ही न था । अरे म्रमित जी गौडफादर की तलाश में तो लोगों की जिंदगियां गुजर जातीं हैं और उन्हें गौडफादर की शक्ल देखना तक नसीब नहीं होता । एक आप हैं कि आपने गौडफादर से बात कर ली । गौडफादर जिनके सिर पर अपना हाथ रख दें उनकी जिंदगी तो रातोंरात बदल जाती
है । जिन्हें कल तक कोई न पूछता हो उनके आगे फन्ने खाँ से फन्ने खाँ भी सिर झुकाते हैं । ऐसे लोगों की हर जगह, चाहे राजनीति हो या बिजनेस सभी जगह बल्ले- बल्ले होती है ।
एक तरफ चरनदास जी गौडफादर की महिमामंडन में लीन थे तो दूसरी तरफ़ मैं पसीने – पसीने हो रहा था । इतना नरवस हो रहा था कि अब गिरा कि तब गिरा ।
मेरी हालत देख कर चरनदास जी भावुकता की दुनिया स बाहर आ गये और मुझ से पूछने लगे क्या हुआ भ्रमित जी, आपकी तबीयत तो ठीक है ?
मैने कहा – हाँ सब ठीक है ।
अच्छा भ्रमित जी बताइये आपकी गौडफादर से क्या – क्या बात हुईं ? वह देखने में कैसे हैं ?
मैंने कहा – ठाटबाट वाले हैं । इसके बाद मैने गौडफादर के साथ हुई बातचीत का विवरण कुछ इस प्रकार दिया ।
मैने पूछा – प्रभु आप जिसके सिर पर हाथ रख देते हैं, वह सफलता की मंजिलें चूमने लगता है ।
वह बोले – हाँ यह सब तो है । इसलिए तो आजकल सफलता की लालसा लिए व्यक्ति मेरी तलाश में रहता है ।
प्रभु आप किस पर कृपा करते हैं ?
जो विश्वस्नीय हो, काम का हो योग्य हो । वैसे हर गुणवान होता है । आवश्यकता उसके गुणों को विकसित करने की होती है । र्पयाप्त साधन एवम् अवसर मिलें तो वह सफलता की मंजिलें चूमने लगता है ।
और कोई प्रश्न वत्स ?
प्रभु गौडफादर से आशीर्वाद पाने के लिए क्या किया जाय ?
गौडफादर और भक्त दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत रहती है । यह सतत खोज अभियान है ।
अच्छा शुभरात्रि वत्स ।
इतना कह कर गौडफादर चले गए और मैं अपने बिस्तर पर छटपटाता ही रह गया ।
क्या---? गौडफादर से मिलने की बात एक सपना थी?
मैने सकपकाते हुए कहा – हाँ चरनदास जी यही सच है । इसके बाद वह तमतमाते हुए चल दिए । मुझे उनके गुस्से के वे शब्द आज भी याद हैं कैसे कैसे लोग इस दुनिया में हैं । सारा टाइम खराब कर
 दिया । इन लेखकों के साथ यही समस्या है । ये वास्तविकता में कम ख्याली दुनिया में ज्यादा रहते हैं ।



Sunday, June 18, 2017

On Father's Day

   
On 14th May, we celebrated Mother's Day and today on 18th
June , we are celebrating Father's Day. Does it not seem to be
ritualistic way to celebrate all these important days?. Will this
way serve any social purpose? It  is a well established fact, that the role of Mother and Father play a very crucial in the process of development of children. They are the guardians of new generation. So, being a guardian, it becomes the bounded duty to prove to be a good role model before their children and hence provide them right guidance to be a good human being.

But what we are witnessing, we feel least concern for good human values. That's why we use to listen from the people that family values are on the decay? If we want to change this situation, then we have to think it over very seriously. Otherwise

Such celebration prove to be fruitless.

Sunday, May 28, 2017

यदि आज कबीर होते तो

यदि आज कबीर होते तो …..
यदि कबीर दास जी आज के जमाने में होते तो उनकी स्थिति क्या होती ? इस विषय पर मंथन करते ही भ्रमित की रूह काँप उठी । उसने सोचा, चलो अपने साहित्यकार मित्र, जो कि आजकल काफी प्रतिष्ठित हैं, के विचार इस संबंध में जान लिये
 जायें ।
भ्रमित ने उनसे जा कर इस विषय पर बातचीत
की । प्रस्तुत हैं बातचीत के संक्षिप्त अंश:
जैसे ही भ्रमित ने अपने साहित्यकार मित्र के कमरे में प्रवेश किया, तो उमहोहोने उसका स्वागत कुछ इस प्रकार किया।
आइये, मित्रवर आइये, फिर तपाक से बोले – मीडिया से आयो है, क्या गुप्त कैमरा लायो है ?
भ्रमित ने तुरन्त कहा –  महोदय, मैं जासूसी पत्रकारिता नहीं करता ।
साहित्यकार महोदय ने ठंडी आह भरी और कहा – करते तो अच्छा था । इसमें लाखों के वारे न्यारे ह़ोते हैं ।
लेकिन इसमें रिस्क ज्यादा है ।
स़ो तो है । लेकिन इसमें जितना रिस्क है, उतना ही फायदा भी है ।
भ्रमित ने भी उनके कथन में हाँ में हाँ मिला दी । मुख्य विषय – कबीर दास जी के प्रसंग से अपने आप को भटकता देख, भ्रमित ने कहा,  महोदय – अब मैं आपका ध्यान अपने मुख्य विषय - कबीर दास जी के प्रसंग यानि कि,  यदि कबीर दास जी, आज के जमाने में सशरीर मौजूद होते तो उनके साथ कैसा सलूक होता ? के बारे में आपके विचार जानना चाहता था । मैं इसी विषय पर आप के विचार जानने के लिए आया था ।
भ्रमित की बात सुन कर, साहित्यकार महोदय चिंतामग्न हो गये और फिर बोले, देखिये ऐसे संत का आज के समाज के साथ क्या सामंजस्य हो सकता है यह एक गंभीर विषय है । मेरे विचार में मुझे कोई सार्थक सामंजस्य दिखाई नहीं देता ।
भ्रमित ने जब उनसे इस का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा -  उदाहरण के लिए देखिये वह कहते है -  कबिरा खडा बजार में,  सब की माँगे खैर
  ना काऊ से दोस्ती,  ना काऊ से बैर ।
फिर वह कहने लगे,  अब आप ही बताइये, आज के जमाने म़ें, दिल्ली जैसे शहर में क्या कोई ऐसे व्यक्ति को कोई खडे रहने दे सकता है ? क्योंकि हर शहर व सडक अपने कुछ रहस्य छिपाये रहता है ।
हर कोई, ऐसे व्यक्ति से डरेगा । उसकी दोस्ती से भी और उसकी दुश्मनी से भी । वैसे भी दिल्ली यातायात की रेलमपेल में ऐसे व्यक्ति के लिए खडे़ होने की बात भूल कर बच निकलना ही भारी होगा ।
अगर खड़़े रहना ही है तो अपने उपरोक्त कथन में कछ बदलाव करना  होगा ।
तो क्या कहना होगा ?
उन्हें कहना होगा –
कबिरा खड़ा बजार में खुद की माँगे खैर ।
हर काऊ से दोस्ती,  हर काऊ से बैर ।।
भ्रमित ने पूछा – क्या आप ऐसे महान संत से ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं ?
तब तो बाजार में क्या, समाज में ही खड़े होने के लिए जगह नजर नहीं आती ।
भ्रमित ने कहा -  मन्दिर -  मस्जिद के आगे त़ो खड़़े हो ही सकते हैं ?
कदापि नहीं ! मन्दिर -  मस्जिद वाले तो उन्हें अपने आसपास फटकने भी न देंगे । ज़ो व्यक्ति उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करे । ऐसे व्यक्ति को वे क्यों कर सहारा देंगे । वे उनकी निम्न बातें कैसे भूल सकते हैं । आप को तो याद है उन्होने इस संबंध में क्या कहा है l
उन्होने कहा है –
कांकर पाथर पाथ के,  मस्जिद लई बनाय ।
ता ऊपर चड़ मुल्ला बाग दे,  बहरा हुआ खुदाय ।।
                          और
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़ ।
ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार ।।
तब तो उनके पास अपने स्वभाविक चरित्र साधुत्व के सिवाय, कुछ शेष नहीं बचता ?
म्रमित के उक्त कथन पर साहित्यकार मित्र बोले  क्या सोचते हो ? आज का साधु समाज उनको स्वीकार करेगा ? शायद नहीं !
साधुओं के संबंध में उनकी कही गयी बातें उन्हें साधु समाज में भी चैन से नहीं रहने देंगी । जैसे वह कहते हैं –
  साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।
   सार सार को गहि रहे थोथा दे उडाय ।।
ठंड़ी आह भर कर भ्रमित ने पूछा -  क्या इस कथन में भी परिवर्तन करना पड़ेगा ।
वह बोले निश्चित तौर पर ।
तो उन्हें क्या कहना चाहिए ।
उन्हे कहना चाहिए –
साधु ऐसा चाहिए जो राजनीति कर पाय ।
राजनीति के बल पर ख्याति खूब कमाय ।।
उपरोक्त कथन सुन कर भ्रमित ने पूछा – अगर यही साक्षात्कार आप के नाम के साथ प्रकाशित हो जाये तो ?
वह हँसने लगे और कहने लगे आप हमारे मित्र हैं और मित्रों की अन्तरंग बातें सावर्जनिक नहीं की जातीं । यह बात सुन कर भ्रमित निरुत्त्तर हो कर घर वापिस चला आया ।


Sunday, May 14, 2017

मदर्स डे

मदर्स डे
आज मदर्स डे है । हर साल 14 मई को यह दिवस दुनिया भर में मनाया
जाता है । लेकिन ये समारोह आज एक औपचारिकता मात्र नहीं रह गये हैं ?
क्या आज अपनी माँ को उसका उचित सम्मान दे पायें है जिसकी वह अधिकारी है ।
आखिर क्यों ? क्या यह सच नहीं हैं कि आज हम पारिवारिक मूल्यों के पतन के शिकार हैं ।
आज संयुक्त परिवार की जगह एकल व्यक्ति परिवार ले रहा है । बात तो इससे भी आगे बढ कर सिंगिल मदर और सिंगिल फादर का चलन भी जोरों पर है जो भविष्य में मदर्स डे और फादर्स डे की अवधारणा को ठेस पहुंचायेंगे । बच्चे मदर्स डे पर माँ को तरसेंगे और फादर्स डे पर फादर के लिये ।
अतः समय की पुकार है हम मदर्स पूरे सम्मान के साथ इस तरह से मनायें कि व्यक्तिवादी आत्मकेन्द्रित सोच पर लगाम लगायी जा सके और परिवार में माँ – बाप भाई,  बहन सभी का सम्मान बना रहे ।



Sunday, April 16, 2017

समय का फेर ।

समय का फेर
बात सन 1960 के आस पास की है उस समय मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी स्कूल की प्राइमरी कक्षा में पढता था । एक दिन हमारे अध्यापक ने हम  छात्रों को एक कहानी “भय का भूत” सुनायी थी । जो इस प्रकार थी ।
एक गाँव में राम किशोर नाम का एक किसान रहता था । वह भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता था । उसी के गाँव में धनीराम नाम का एक अन्य किसान रहता था। वह बहुत ही पूजा पाठी किस्म का व्यक्ति था । एक दिन राम किशोर की धनीराम से इस बात पर बहस हो गयी कि भूत होता है या नहीं ? रामकिशोर
 का कहना था कि भूत नाम की कोई चीज नहीं
होती । यह सब ढकोसला है। जब कि धनीराम का मानना था कि भूत होता है । उसने जोर दे कर कहा कि भूत गाँव के बाहर शमशान घाट के बगल वाले बाग में रहता भी है । जिसको यकीन ना ह़ो वह रात 12 बजे वहाँ जा कर देख ले ।
रामकिशोर ने धनीराम की यह चुनौती मंजूर कर
ली।  इसके बाद वह उसी रात को 12 बजे शमशान घाट के बगल वाले बाग में भूत से मिलने के लिए घोडे पर सवार हो कर चल पढा । बाग में पहुँच कर उसने घोड़े को पास में ही खूँटे से बाँध दिया और चबूतरे पर बैठ कर भूत के आने का इन्तजार करने लगा । काफी देर तक बैठे रहने के बाद, वह ज्यों ही घर वापिसी के लिए तैयार हुआ, तभी बाग में ठंडी  ठंडी हवा चलने लगी और पेड़ों के पत्त्ते खड़खड़ाने लगे।  यूँ तो रामकिशोर, भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता
 था। लेकिन, इसके साथ ही साथ भूत प्रेतों के बारे में उसके मन में एक संशय भी था । जिसके कारण पत्त़ों की खड़खड़ाहट को वह ठीक से समझ न सका और ड़र गया । उसे लगा कि भूत आ गया है और हडबडाहट में घोड़े पर चढ कर जोर से घोड़े को चाबुक मारी और घोड़ा खूँटा तोड़ कर घर की ओर दौड़ने लगा । घोड़े के दौड़ने के कारण खूँटा बार बार उसकी कमर में लगने लगा । रामकिशोर घबराहट में सोचने लगा कि भूत उसकी पिटाई कर रहा है । जिससे उसका ड़र और  बढ़ गया । किसी तरह वह घर तो पहुँच गया लेकिन बीमार पड़ गया और कुछ दिनों में ही म्रत्यु हो गई ।
यह कहानी सुने हुए मैं बच्चे से बूढा हो चला, लेकिन लगता है ! अंथविश्वास एवम् कूपमंडूकता के खिलाफ लड़ाई ज्यादा आगे बढने के बजाय उल्टी दिशा में चल पड़ी है । आज का प्रचार तंत्र चाहे वह टीवी चैनल हों या समाचार पत्र समूह, सभी अंथविश्वास और मायावी शक्तियों के प्रचार प्रसार में इस तरह से जुटें है कि तर्क संगत सोच हाशिए पर चली गयी है । शायद यही समय का फेर है ।

Tuesday, March 28, 2017

Rationalization of Convenience

Everything is Fair in Love and War, Is it so ?
I use to  listen this proverb  from time to time, from many  quarters. Keeping in mind to get a right approach on this devastating thought, I,,,  decided to meet Mr. Vivek Kumar Vivek – An intellectual of our locality. Mr. Vivek by no means can  be called as an  Intellectual, since he doesn’t possess any higher Academic qualification. But  it is his logic and reasoning that makes him a different person from others.
When I met him, he was free to discuss.  I placed my question before him. After listening my question, He said, in my opinion, I don’t subscribe the Idea that Everything is Fair in Love and War. The simple reason behind my No lies in the fact that every profession or human act is governed by certain humafor values. So as a matter of principle, no place is reserved for perverse thought or culture. For instance, take a Case of any profession be it be s Medical Profession, Law Profession,  everywhere, you will find, these are governed by human values. Although, there is a widespread violation of Professional Values too, but that  doesn’t replace the Concept of Professional Values.
Now let us take the case of Love. Love is generally  considered as a matter of higher human values, in which No Foul plays a desirable. It is generally based on mutual love and trust. Then, how an perverse thought , Everything is Fair in Love and War can get, justification in this concept. Gross violation of these values Is the  order of the day  but that doesn’t alter concept of Love
 In the same way, if you will analyse the applicability of this perverse thought in war, then you will find the hollowness of this thought. In case of War, there are worldwide accepted War Norms which are to be followed by war engulfed Nations.
What do you think about the origin of  thought? I think this might be an attempt to rationalize the misdeed of the people. But I don’t say, the people using this phraseology are those engaged in misdeeds. It might be possible they may be using this phraseology unknowingly.

Tuesday, March 14, 2017

About Me

About Me
Friends,
I am a freelance writer,  I write in English language as well se in Hindi. In English, I write Articles on current topics. In Hindi, I write Stories, Satires, and Articles on Current Affairs. In short, this is about me.

In future,  friends may find interesting  Stories, Articles and Satires. In this post you will find an interesting Satires in Hindi
Title - Chamcheria Hua  Please visit and enjoy.


चमचेरिया हुआ
अपने एक मित्र हैं फक्कड नाथ फक्कड, सुबह-सुबह ही हमारे घर पर आ धमके । मित्र होने के कारण उनका यह अधिकार तो बनता ही है कि वह कभी भी किसी भी समय हमारे घर आ धमके ।
आते ही कहने लगे, भ्रमित  जी ,चलिये  डाक्टर विश्वास से मिलने चलते हैं ।
मैंने उत्सुकतावश पूछा, क्या हुआ फक्कड जी, आज सुबह सुबह ही डाक्टर विश्वास की याद कैसे आ गयी ?
कहने लगे, भृमित जी, माना, डाक्टर विश्वास पेशे से आखों के डाक्टर है लेकिन हमारे अच्छे मित्र भी हैं । काफी दिन हो गये, उनसे मुलाकात भी नहीं हुई । उनसे मिलने का मन कर रहा था, सोचा आपको भी साथ ले चलू ?
मैंने भी उनकी हाँ मे हाँ मिला दी । इस तरह हम पहुंच गये डाक्टर विश्वास के पास ।

डाक्टर विश्वास, उस समय कोई व्यस्त ना थे, इसलिए मिलने में कोई परेशानी नहीँ हुई
हमें देखते ही, डाक्टर विश्वास तपाक से ब़ोले, आइये मित्रवर आइये, फिर फक्कड जी को मुखातिब हो कर कहने लगे,  फक्कड जी सब कुशल मंगल तो है? आज हमारी याद कैसे आ गई?
फक्कड जी कहने लगे, डाक्टर साहब, आज के जमाने में कुशल मंगल की बात करना तो
अच्छा लगता है, लेकिन होता नहीं है ।
क्या आंख दिखाने आऐ हैं?
फक्कड जी कहने लगे, आंख दिखाना, डराना, धमकाना ?
क्या डाक्टर साहब आप हमसे ऐसी उम्मीद करते हैं ?
वैसे डराना धमकाना न तो हमारे बस की बात है और न हमारे सोच विचार में ।
तभी डाक्टर साहब के किलीनिक में एक मरीज ने कदम रखा ।
इसके बाद डाक्टर साहब मरीज से बात करने लगे । औऱ इस तरह बातचीत में रुकावट आ गई ।
डाक्टर साहब – बताइये आपको क्या तकलीफ है ?
डाक्टर साहब – लगता है कि मेरी नजर में खोट आ गया है?
मरीज की बात सुन कर डाक्टर विश्वास चकराए, सोचने लगे,  आमतौर पर मरीज अपनी परेशानी बताता है,  जैसे कि पास की नजर कम होना या दूर की नजर कम होना या नजर का ही कम होना । लेकिन नजर में खोट ?
फिर भी डाक्टर साहब ने मरीज की पूरी नजर टैस्ट की ।
फिर डाक्टर साहब ने कहा – आपकी तो नजर पूरी तरह से ठीक है । फिर समस्या कहाँ है?
मरीज कहने लगा – जी मुझे हर चीज अच्छी दिखाई देती है । आप पेशे से डाक्टर हैं, मुझे इस पेशे में कुछ भी बुराई नहीं दिखाई देती । कुछ भी गलत नहीं दिखाई देता। जैसे

झोलाछाप डाक्टरों का , डाक्टरी करना । यानि कि, किसी भी पेशे में मुझे कोई अनफेयर प्रैक्टिस नजर नहीं आती जिसे आमतौर पर अनफेयर प्रैक्टिस माना जाता है ।
मरीज की बात सुन कर डाक्टर साहब गहरे सोच में डूब गये, फिर थोड़ी देर बाद,  मरीज से पूंछने लगे – अच्छा बताइये, आप कहाँ काम करते हैं ? आप के अपने बास के .साथ कैसे संबंध हैं? आप कितने समय से मौजूदा कंपनी में हैं ? आपकी कितने समय से तरक्की नहीं हुई है ?
इतने सारे प्रश्न एक साथ पूंछने पर मरीज घबरा कर पूछने लगा – डाक्टर साहब मुझे हुआ क्या है ?
डाक्टर विश्वास कहने लगे,  आप पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दीजिए फिर मैं आप को बताऊँगा कि आप को क्या हुआ है।
मरीज कहने लगा, डाक्टर साहब,  मैं एक प्राइवेट कम्पनी बतौर एक एकाउन्टैंट काम करता हूँ । पिछले छः सात साल से काम कर रहा हूँ । मैं एक सक्षम अधिकारी हूँ । लेकिन  तरक्की के मामले में जीरो हूँ । मेरे अपने बास के साथ संबंध सामान्य हैं,  पर घनिष्ठ नहीं । मेरे से जूनियरों का प्रमोशन होता रहता है, पर मैं वहीं का वहीं पडा हूँ । मेरी तरक्की नहीँ होती । अब बताइए, डाक्टर साहब मुझे क्या हुआ है?
डाक्टर विश्वास कहने लगे – देखिये, मेरे विचार से आप को  चमचेरिया हुआ है ।
चमचेरिया ? क्या यह भी कोई बीमारी है ?
डाक्टर साहब कहने लगे, हाँ यह भी एक किस्म की बीमारी है । जैसे मलेरिया होता है, लवेरिया होता है । उसी तरह से चमचेरिया होता है । यह रोग ज्यादातर कैरियर की दहलीज पर खडे व्यक्तियों को जल्दी होता है या तरह-तरह की ठोकर खाये व्यक्तियों को । लेकिन यह कोई बाल रोग नहीं है । उस समय तो व्यक्ति एक खास किस्म का होता है, उसे उस समय न पिटने का डर होता है और नहीं पीटने का । यह रोग उन व्यक्तियों को भी जल्दी होता है, जो अपने आशातीत सपनों को जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहते हैं । इसके अलावा इस में वे व्यक्ति भी शामिल हैँ जो अपनी खद्दारी से तंग आ चुके है आप में  भी मुझे चमचेरिया के लक्षण नजर आ रह हैं
अब क्या होगा? डाक्टर साहब, मरीज ने पूँछा ।
घबराने की कोई बात नहीं,  मुझे आप का भविष्य उज्जवल नजर आ रहा है । यह रोग न तो आप क़ो शारीरिक कष्ट पहुँचाएगा और न ही मानसिक । जब खद्दारी ही नहीं बचेगी, तो चमचेरिया आप का क्या बिगाडेगा ?
तभी मैंने फक्कड जी के कान में कहा, देखो, अपने डाक्टर विश्वास हैं तो डाक्टर आँखों के और इलाज कर रहे हैं मानसिक रोग का ?
फक्कड जी ने मेरे कान में फसफुसाया, भ्रमित जी इसमें बुराई क्या है ? जब झोला छाप डाक्टर, डाक्टरी कर सकते हैं । बगैर पढे किताब की व्याख्या जा सकती है तो डाक्टर विश्वास आँखों के रोग के डाक्टर होते हुये मानसिक रोग का इलाज क्यों नहीं कर सकते? आज किसी विषय पर व्याख्यान देने के लिए उस विषय विशेष का एक्सपर्ट होना लाजिमी तो  नहीं है । क्या ऐसे विशेषज्ञ आप को ढूँढने से नहीं मिलेंगें ?
दूसरी तरफ डाक्टर विश्वास अपने मरीज क़ो समझा रहे थे कि आप अपने बास पर अपनी योग्यता एवं वफादारी की धाक कैसे जमा सकते  हैं । अच्छा बताइए, आप का अपने संग-साथियों के साथ कैसा संबंध है?
मरीज ने कहा – मैं तो अपने सभी संग-साथियों के साथ हँस कर, प्यार से बात करता हूँ

डाक्टर विश्वास कहने लगे- अगर आप अपनी सफलता की सीढियों में छलांग लगाना चाहते हैं तो कल से यह सब बंद । आप अपने सभी संग- साथियों के साथ गंभीरता से बातचीत करेंगे, वह भी टू दी पाइंट, कोई हँसी मजाक नहीं । अपने एवं अपने संग-साथियों के बीच एक उचित दूरी बनाकर रखेंगे । लंच टाइम में अपना लंच नहीं करेंगें । आगे पीछे कभी भी करिये, अच्छा तो यही रहेगा कि सुबह-शाम भोजन की आदत डालिये । लंच टाइम में  या आफिस आवर्स के बाद, बास के आफिस या चैंबर के चक्कर काटिये, स्टाफ की चुगली का कोई अवसर मत चूकिये । बात-बेबात बास से मिलने की कोशिश कीजिये और बास को यह अहसास कराने की कोशिश कीजिए कि आप बफादारी के मामले में किसी से कम नहीं हैं । हाँ आफिस में देर तक रुकने की आदत डालिये इससे आप को अपने बास से निकटता
बनाने में मदद मिलेगी । पहले-पहल हो सकता है, बास आप की उपेक्षा करे । आप निराश मत होइये, आप लगे रहिए ।
देर- सवेर में, आप पर आपके बास का विश्वास जमेगा औऱ आप की प्रगति का दरवाजा खुल कर रहेगा ।
इतनी बात सुन कर मरीज, डाक्टर साहब को मार्गदर्शन फीस की  राशि दे कर चला गया।

इसके बाद फक्कड जी ने डाक्टर साहब से उनके इस तत्व ज्ञान की सार्थकता पर प्रश्न पूछा तो डाक्टर साहब कहने लगे – मैंने जो सफलता का ज्ञान अपने मरीज को दिया है वह अपवाद से परे नहीं है ।
डाक्टर साहब की बात सुन कर, हम तो निरुत्तर हो गये । क्या आप भी ?