Sunday, April 16, 2017

समय का फेर ।

समय का फेर
बात सन 1960 के आस पास की है उस समय मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी स्कूल की प्राइमरी कक्षा में पढता था । एक दिन हमारे अध्यापक ने हम  छात्रों को एक कहानी “भय का भूत” सुनायी थी । जो इस प्रकार थी ।
एक गाँव में राम किशोर नाम का एक किसान रहता था । वह भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता था । उसी के गाँव में धनीराम नाम का एक अन्य किसान रहता था। वह बहुत ही पूजा पाठी किस्म का व्यक्ति था । एक दिन राम किशोर की धनीराम से इस बात पर बहस हो गयी कि भूत होता है या नहीं ? रामकिशोर
 का कहना था कि भूत नाम की कोई चीज नहीं
होती । यह सब ढकोसला है। जब कि धनीराम का मानना था कि भूत होता है । उसने जोर दे कर कहा कि भूत गाँव के बाहर शमशान घाट के बगल वाले बाग में रहता भी है । जिसको यकीन ना ह़ो वह रात 12 बजे वहाँ जा कर देख ले ।
रामकिशोर ने धनीराम की यह चुनौती मंजूर कर
ली।  इसके बाद वह उसी रात को 12 बजे शमशान घाट के बगल वाले बाग में भूत से मिलने के लिए घोडे पर सवार हो कर चल पढा । बाग में पहुँच कर उसने घोड़े को पास में ही खूँटे से बाँध दिया और चबूतरे पर बैठ कर भूत के आने का इन्तजार करने लगा । काफी देर तक बैठे रहने के बाद, वह ज्यों ही घर वापिसी के लिए तैयार हुआ, तभी बाग में ठंडी  ठंडी हवा चलने लगी और पेड़ों के पत्त्ते खड़खड़ाने लगे।  यूँ तो रामकिशोर, भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता
 था। लेकिन, इसके साथ ही साथ भूत प्रेतों के बारे में उसके मन में एक संशय भी था । जिसके कारण पत्त़ों की खड़खड़ाहट को वह ठीक से समझ न सका और ड़र गया । उसे लगा कि भूत आ गया है और हडबडाहट में घोड़े पर चढ कर जोर से घोड़े को चाबुक मारी और घोड़ा खूँटा तोड़ कर घर की ओर दौड़ने लगा । घोड़े के दौड़ने के कारण खूँटा बार बार उसकी कमर में लगने लगा । रामकिशोर घबराहट में सोचने लगा कि भूत उसकी पिटाई कर रहा है । जिससे उसका ड़र और  बढ़ गया । किसी तरह वह घर तो पहुँच गया लेकिन बीमार पड़ गया और कुछ दिनों में ही म्रत्यु हो गई ।
यह कहानी सुने हुए मैं बच्चे से बूढा हो चला, लेकिन लगता है ! अंथविश्वास एवम् कूपमंडूकता के खिलाफ लड़ाई ज्यादा आगे बढने के बजाय उल्टी दिशा में चल पड़ी है । आज का प्रचार तंत्र चाहे वह टीवी चैनल हों या समाचार पत्र समूह, सभी अंथविश्वास और मायावी शक्तियों के प्रचार प्रसार में इस तरह से जुटें है कि तर्क संगत सोच हाशिए पर चली गयी है । शायद यही समय का फेर है ।

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