यदि आज कबीर होते तो …..
यदि कबीर दास जी आज के जमाने में होते तो उनकी स्थिति क्या होती ? इस विषय पर मंथन करते ही भ्रमित की रूह काँप उठी । उसने सोचा, चलो अपने साहित्यकार मित्र, जो कि आजकल काफी प्रतिष्ठित हैं, के विचार इस संबंध में जान लिये
जायें ।
भ्रमित ने उनसे जा कर इस विषय पर बातचीत
की । प्रस्तुत हैं बातचीत के संक्षिप्त अंश:
जैसे ही भ्रमित ने अपने साहित्यकार मित्र के कमरे में प्रवेश किया, तो उमहोहोने उसका स्वागत कुछ इस प्रकार किया।
आइये, मित्रवर आइये, फिर तपाक से बोले – मीडिया से आयो है, क्या गुप्त कैमरा लायो है ?
भ्रमित ने तुरन्त कहा – महोदय, मैं जासूसी पत्रकारिता नहीं करता ।
साहित्यकार महोदय ने ठंडी आह भरी और कहा – करते तो अच्छा था । इसमें लाखों के वारे न्यारे ह़ोते हैं ।
लेकिन इसमें रिस्क ज्यादा है ।
स़ो तो है । लेकिन इसमें जितना रिस्क है, उतना ही फायदा भी है ।
भ्रमित ने भी उनके कथन में हाँ में हाँ मिला दी । मुख्य विषय – कबीर दास जी के प्रसंग से अपने आप को भटकता देख, भ्रमित ने कहा, महोदय – अब मैं आपका ध्यान अपने मुख्य विषय - कबीर दास जी के प्रसंग यानि कि, यदि कबीर दास जी, आज के जमाने में सशरीर मौजूद होते तो उनके साथ कैसा सलूक होता ? के बारे में आपके विचार जानना चाहता था । मैं इसी विषय पर आप के विचार जानने के लिए आया था ।
भ्रमित की बात सुन कर, साहित्यकार महोदय चिंतामग्न हो गये और फिर बोले, देखिये ऐसे संत का आज के समाज के साथ क्या सामंजस्य हो सकता है यह एक गंभीर विषय है । मेरे विचार में मुझे कोई सार्थक सामंजस्य दिखाई नहीं देता ।
भ्रमित ने जब उनसे इस का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा - उदाहरण के लिए देखिये वह कहते है - कबिरा खडा बजार में, सब की माँगे खैर
ना काऊ से दोस्ती, ना काऊ से बैर ।
फिर वह कहने लगे, अब आप ही बताइये, आज के जमाने म़ें, दिल्ली जैसे शहर में क्या कोई ऐसे व्यक्ति को कोई खडे रहने दे सकता है ? क्योंकि हर शहर व सडक अपने कुछ रहस्य छिपाये रहता है ।
हर कोई, ऐसे व्यक्ति से डरेगा । उसकी दोस्ती से भी और उसकी दुश्मनी से भी । वैसे भी दिल्ली यातायात की रेलमपेल में ऐसे व्यक्ति के लिए खडे़ होने की बात भूल कर बच निकलना ही भारी होगा ।
अगर खड़़े रहना ही है तो अपने उपरोक्त कथन में कछ बदलाव करना होगा ।
तो क्या कहना होगा ?
उन्हें कहना होगा –
कबिरा खड़ा बजार में खुद की माँगे खैर ।
हर काऊ से दोस्ती, हर काऊ से बैर ।।
भ्रमित ने पूछा – क्या आप ऐसे महान संत से ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं ?
तब तो बाजार में क्या, समाज में ही खड़े होने के लिए जगह नजर नहीं आती ।
भ्रमित ने कहा - मन्दिर - मस्जिद के आगे त़ो खड़़े हो ही सकते हैं ?
कदापि नहीं ! मन्दिर - मस्जिद वाले तो उन्हें अपने आसपास फटकने भी न देंगे । ज़ो व्यक्ति उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करे । ऐसे व्यक्ति को वे क्यों कर सहारा देंगे । वे उनकी निम्न बातें कैसे भूल सकते हैं । आप को तो याद है उन्होने इस संबंध में क्या कहा है l
उन्होने कहा है –
कांकर पाथर पाथ के, मस्जिद लई बनाय ।
ता ऊपर चड़ मुल्ला बाग दे, बहरा हुआ खुदाय ।।
और
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़ ।
ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार ।।
तब तो उनके पास अपने स्वभाविक चरित्र साधुत्व के सिवाय, कुछ शेष नहीं बचता ?
म्रमित के उक्त कथन पर साहित्यकार मित्र बोले क्या सोचते हो ? आज का साधु समाज उनको स्वीकार करेगा ? शायद नहीं !
साधुओं के संबंध में उनकी कही गयी बातें उन्हें साधु समाज में भी चैन से नहीं रहने देंगी । जैसे वह कहते हैं –
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।
सार सार को गहि रहे थोथा दे उडाय ।।
ठंड़ी आह भर कर भ्रमित ने पूछा - क्या इस कथन में भी परिवर्तन करना पड़ेगा ।
वह बोले निश्चित तौर पर ।
तो उन्हें क्या कहना चाहिए ।
उन्हे कहना चाहिए –
साधु ऐसा चाहिए जो राजनीति कर पाय ।
राजनीति के बल पर ख्याति खूब कमाय ।।
उपरोक्त कथन सुन कर भ्रमित ने पूछा – अगर यही साक्षात्कार आप के नाम के साथ प्रकाशित हो जाये तो ?
वह हँसने लगे और कहने लगे आप हमारे मित्र हैं और मित्रों की अन्तरंग बातें सावर्जनिक नहीं की जातीं । यह बात सुन कर भ्रमित निरुत्त्तर हो कर घर वापिस चला आया ।
यदि कबीर दास जी आज के जमाने में होते तो उनकी स्थिति क्या होती ? इस विषय पर मंथन करते ही भ्रमित की रूह काँप उठी । उसने सोचा, चलो अपने साहित्यकार मित्र, जो कि आजकल काफी प्रतिष्ठित हैं, के विचार इस संबंध में जान लिये
जायें ।
भ्रमित ने उनसे जा कर इस विषय पर बातचीत
की । प्रस्तुत हैं बातचीत के संक्षिप्त अंश:
जैसे ही भ्रमित ने अपने साहित्यकार मित्र के कमरे में प्रवेश किया, तो उमहोहोने उसका स्वागत कुछ इस प्रकार किया।
आइये, मित्रवर आइये, फिर तपाक से बोले – मीडिया से आयो है, क्या गुप्त कैमरा लायो है ?
भ्रमित ने तुरन्त कहा – महोदय, मैं जासूसी पत्रकारिता नहीं करता ।
साहित्यकार महोदय ने ठंडी आह भरी और कहा – करते तो अच्छा था । इसमें लाखों के वारे न्यारे ह़ोते हैं ।
लेकिन इसमें रिस्क ज्यादा है ।
स़ो तो है । लेकिन इसमें जितना रिस्क है, उतना ही फायदा भी है ।
भ्रमित ने भी उनके कथन में हाँ में हाँ मिला दी । मुख्य विषय – कबीर दास जी के प्रसंग से अपने आप को भटकता देख, भ्रमित ने कहा, महोदय – अब मैं आपका ध्यान अपने मुख्य विषय - कबीर दास जी के प्रसंग यानि कि, यदि कबीर दास जी, आज के जमाने में सशरीर मौजूद होते तो उनके साथ कैसा सलूक होता ? के बारे में आपके विचार जानना चाहता था । मैं इसी विषय पर आप के विचार जानने के लिए आया था ।
भ्रमित की बात सुन कर, साहित्यकार महोदय चिंतामग्न हो गये और फिर बोले, देखिये ऐसे संत का आज के समाज के साथ क्या सामंजस्य हो सकता है यह एक गंभीर विषय है । मेरे विचार में मुझे कोई सार्थक सामंजस्य दिखाई नहीं देता ।
भ्रमित ने जब उनसे इस का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा - उदाहरण के लिए देखिये वह कहते है - कबिरा खडा बजार में, सब की माँगे खैर
ना काऊ से दोस्ती, ना काऊ से बैर ।
फिर वह कहने लगे, अब आप ही बताइये, आज के जमाने म़ें, दिल्ली जैसे शहर में क्या कोई ऐसे व्यक्ति को कोई खडे रहने दे सकता है ? क्योंकि हर शहर व सडक अपने कुछ रहस्य छिपाये रहता है ।
हर कोई, ऐसे व्यक्ति से डरेगा । उसकी दोस्ती से भी और उसकी दुश्मनी से भी । वैसे भी दिल्ली यातायात की रेलमपेल में ऐसे व्यक्ति के लिए खडे़ होने की बात भूल कर बच निकलना ही भारी होगा ।
अगर खड़़े रहना ही है तो अपने उपरोक्त कथन में कछ बदलाव करना होगा ।
तो क्या कहना होगा ?
उन्हें कहना होगा –
कबिरा खड़ा बजार में खुद की माँगे खैर ।
हर काऊ से दोस्ती, हर काऊ से बैर ।।
भ्रमित ने पूछा – क्या आप ऐसे महान संत से ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं ?
तब तो बाजार में क्या, समाज में ही खड़े होने के लिए जगह नजर नहीं आती ।
भ्रमित ने कहा - मन्दिर - मस्जिद के आगे त़ो खड़़े हो ही सकते हैं ?
कदापि नहीं ! मन्दिर - मस्जिद वाले तो उन्हें अपने आसपास फटकने भी न देंगे । ज़ो व्यक्ति उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करे । ऐसे व्यक्ति को वे क्यों कर सहारा देंगे । वे उनकी निम्न बातें कैसे भूल सकते हैं । आप को तो याद है उन्होने इस संबंध में क्या कहा है l
उन्होने कहा है –
कांकर पाथर पाथ के, मस्जिद लई बनाय ।
ता ऊपर चड़ मुल्ला बाग दे, बहरा हुआ खुदाय ।।
और
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़ ।
ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार ।।
तब तो उनके पास अपने स्वभाविक चरित्र साधुत्व के सिवाय, कुछ शेष नहीं बचता ?
म्रमित के उक्त कथन पर साहित्यकार मित्र बोले क्या सोचते हो ? आज का साधु समाज उनको स्वीकार करेगा ? शायद नहीं !
साधुओं के संबंध में उनकी कही गयी बातें उन्हें साधु समाज में भी चैन से नहीं रहने देंगी । जैसे वह कहते हैं –
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।
सार सार को गहि रहे थोथा दे उडाय ।।
ठंड़ी आह भर कर भ्रमित ने पूछा - क्या इस कथन में भी परिवर्तन करना पड़ेगा ।
वह बोले निश्चित तौर पर ।
तो उन्हें क्या कहना चाहिए ।
उन्हे कहना चाहिए –
साधु ऐसा चाहिए जो राजनीति कर पाय ।
राजनीति के बल पर ख्याति खूब कमाय ।।
उपरोक्त कथन सुन कर भ्रमित ने पूछा – अगर यही साक्षात्कार आप के नाम के साथ प्रकाशित हो जाये तो ?
वह हँसने लगे और कहने लगे आप हमारे मित्र हैं और मित्रों की अन्तरंग बातें सावर्जनिक नहीं की जातीं । यह बात सुन कर भ्रमित निरुत्त्तर हो कर घर वापिस चला आया ।
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