Wednesday, October 25, 2017

अक्ल बचत के फायदे

अक्ल बचत के फायदे

देखिये साहब, आपने अन्य अनेक किस्म की बचत योजनाओं के बारे में सुना होगा। क्या आपने कभी अक्ल बचत के बारे में सुना है ? नहीं न ? तो आइये हम आपको अपने एक मित्र फक्कड़ नाथ फक्कड से मिलवाते हैं । वह बतायेंगे आपको इसके फायदे । लीजिये सुनिये हमारी बातचीत -
फक्कड जी आपने अक्ल बचत योजना पर काम करना शुरू कर दिया है । क्या यह योजना प्रतिष्ठित मान्यता –“ ज्ञान बाँटने से ज्ञान बढता है” के विरुद्ध नहीं है?
 भ्रमित जी, अगर यही एकमात्र सत्य होता तो कंसल्टेंसी बिजनेस का भविष्य? कंसल्टेंसी बिजनेस का बढता दायरा भी कुछ संकेत करता है ।
तब क्या आप यह कहना चाहते हैं ? कि यह एकमात्र सत्य नहीं है ।
सत्य तो यही है ।
 अच्छा, आप बताइए आपकी अक्ल बचत योजना से आम जनमानस को क्या लाभ हैं ?
म्रमित जी आप बास नाम के जीव के बारे में तो जानते ही होंगे । यह जीव सर्वव्यापी है, यह घर आफिस सभी जगह मौजूद है । यह अकेला नहीं है । इसकी भी मल्टी लेवल चेन है । यह आवश्यक नहीं है कि जो महाशय आफिस में कड़क आफीसर हैं वह घर में भी अपनी आफीसरी प्रतिष्ठा बनाए रखें हों । यानि, कि घर में कड़क आफीसर के बजाय म्याऊँ बने हुए न होँ । अतः स्पष्ट है कि, आप का इन महान विभूतियों के बीच कार्य करना कोई हँसी खेल नहीं है । अगर आप  इन विभूतियों के बीच अपनी सृजनशील बुद्धि का इस्तेमाल करेंगे तो आप पर आये दिन मुशीबत आती जाती रहेगी । इसलिए इस मामले में अक्ल बचत का फार्मूला आपकी काफी मदद कर सकता है ।
अगर आप सृजनशील नागरिक हैं और किसी निजी या सरकारी आफिस में काम करते हैं तो यह अक्ल बचत योजना आपके लिए बड़े काम की है । आप बस, अपने बास की अकल की योजना को अमलीजामा पहनाइऐ और सुखी रहिये । यानि कि बास की योजना को अपनी सृजनशील बुध्दि के बिना लागू कीजिए । आपका सृजनशील योगदान सफलता की स्थिति में आप की वाहवाही का कारण तो बनेगा  लेकिन जरा सी चूक में आप पर मुशीबत का पहाड़ भी टूट पड़ेगा । अतः उचित यही है कि आप अक्ल बचत योजना को अपने जीवन में अपनाएं । जितनी योग्यता से आप इसे अपनी निजी जीवन में लागू करेंगे, यह उतनी ही तेजी से यह आपकी सफलता का राज भी बनेगी ।
अगर आप वरिष्ठ नागरिक हैं तो यह योजना आपके लिए बहुत ही काम की है । वरिष्ठ नागरिकों की,  मेरे विचार में एक बड़ी समस्या अपना ज्ञान बाँटने की होती है जिसको सुनने वाला कोई नहीं होता। यह समस्या अन्य अनेक समस्याएं खडी करती रहती है। इसके अलावा ये सज्जन पूर्व में बास रहे हैं और ऊँची आवाज में बोलने के आदी हैं । बदली हुई परिस्थिति में उन्हें ऊँची आवाज में नहीं धीमी आवाज़ में बोलना है । यह स्थिति उन्हें तनाव व कुंठा की ओर ले जाती है । लेकिन वे हैं कि अपनी आदत से बाज नहीं आते । इसके अलावा उनका अकेलापन उनको काटने को दौडता है । बात बे बात उनकी हर  सलाह उनको अप्रसांगिक साबित करती रहती हैं । जो उन्हें हताशा की ओर धकेलती है ।
 यह योजना उनके लिए भी बड़ी लाभकारी है जो कि    हाँ जी हाँ जी प्रवृत्ति के लिये जाने जाते हैं ।
लेकिन सृजनशील व्यक्तियों के लिए इस योजना का क्या लाभ है ?
देखिए भ्रमित जी यह योजना सबका साथ सबका विकास योजना का हिस्सा नहीं है ।
अच्छा, फक्कड जी आप वरिष्ठ नागरिकों के लिए इस योजना के लाभ के बारे में कुछ और बताइयेंगे ।
देखिये भ्रमित जी वरिष्ठ नागरिक पूर्व में बास थे जो अब सत्ताच्युत हो चुके हैं और घर में ही एकांत जीवन बिता रहे हैं । वे घर के संपूर्ण घटना क्रम पर नजर रखते हैं । कुछ भी गलत दिखाई देने पर अपनी राय देने से नहीं चूकते । जिसके कारण उन्हें अक्सर अपमानित तक होना पड़ता है । ऐसे अपमान से बचने में उनका मौन व्रत काफी सहायक हो सकता है । यानि कि अक्ल बचत योजना ।
क्या यह आदर्श स्थिति है ?
नहीं बिल्कुल नहीं । लेकिन यह मौजूदा समय का कठ़ोर सत्य है ।
क्या इसका कोई विकल्प नहीं ।
है क्यों नहीं । लेकिन वह खोज का विषय है । आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाइये और इस तरह की समस्याओं का ड़ट कर मुकाबला करें ।

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Sunday, October 22, 2017

कसक

कसक
अमीना ने जैसे ही दरवाजा खोला, देखा कि सामने से मेधावी चली आ रही है ।
सुबह – सुबह किधर जाया जा रहा है ? पास आने पर अमीना ने मेधावी से पूछा ।
अरी ! अमीना तुझ से ही मिलने आ रही हूँ ।
तो फिर आ अन्दर, बैठ कर बात करते हैं ।
इसके बाद दोनों सहेलियां कमरे के अन्दर बैठ कर बातें करने लगीं ।
अमीना ने पूछा -आजकल तेरी बंगला काल़ोनी का क्या हाल है ?
मेधावी ने ठंडी आह भरी ! और फिर कहने लगी अब हमारी बंगला कालोनी कहाँ रही ? कभी यह बंगला कालोनी हुआ करती थी, जब यहाँ पर कोठी बंगले हुआ करते थे । अब तो यहाँ पर,  बस फ्लैट ही फ्लैट नजर आते हैं । अब इसे फ्लैट कालोनी कहो तो ज्यादा अच्छा है ।
सब वक्त की बात है,  वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता,  अमीना ने कहा ।
वह तो मै देख ही रही हूँ ! वक्त इतना तेजी से बदल जाता है, पता न था ? मेधावी ने कहा ।
और क्या बदल गया ? अमीना ने पूछा
 अब यह भी कोई बताने की बात  है ? मै एक घंटे से बक – बक किये जा रही  हूँ  और एक तू है कि  न तो चाय को पूछती है और न ही पानी क़ो ! मेधावी की बात सुन कर ,  अमीना शर्मिंन्दा होते हुए बोल उठी ! हाय राम ! म़ैं भी कितनी बाबली हूँ ? कि चाय – पानी तक पिलाना भूल गयी ?  मैं अभी आती हूँ , तू बैठ, कह कर झट से किचन में पानी  लेने चली गयी । जैसे ही अमीना पानी लेकर आयी
मेधावी ने अमीना से कहा – अमीना बैठ, तुझ से जरूरी बात करनी है ।
 ना बाबा न ! अब मैं पहले वाली गलती नहीं करने वाली । पहले तू चाय पी, फिर आगे बात होगी ।
चाय नाश्ता करने के बाद अमीना ने पूछा – अब बता,  मेधा्वी क्या बात करनी है ?
मेधा्वी ने पूछा – सच बता ! अमीना क्या तू जन्म से मुसलमान है या शादी के बाद मुसलमान बनी
है ?
मैं त़ो जन्म से ही मुसलमान हूँ । मेरी अम्मी और अब्बा पास की ही कालोनी में रहते हैं । पर तू मुझ से यह सब आज क्यों पूछ रही है । पहले तो कभी भी, आज तक यह सवाल नहीं पूछा ? फिर आज क्यों ?
सच कहूँ ! बुरा तो नहीं मानेगी ? तू जन्म से मुसलमान है ही नहीं ।
तो पंडित जी ! आपने मेरा हाथ देख कर जाना है आपने ?
नहीं ! तू तो बुरा मान गयी । चल छोड, नहीं बताना चाहती तो मत बता ! कोई बात नहीं ।
बात है । तूने यह बात मेरे बारे में कैसे कही ?
अमीना सच कडवा ह़ोता है । कभी कभी बहुत चुभने वाला भी । लेकिन सच त़ो सच ही होता है । जानना चाहती है कि यह सच मैने कैसे जाना तो सुन । इन्सान जब सोच समझ कर बोलता है तो वह कोई गलती नहीं करता । लेकिन जब वह आवेग में, भावावेश में या उल्लास में ब़़ोलता है तो वह बात भी बोल जाता है जो उसके अतीत की झलक दिखला जाता है । तुम्हारे साथ भी आज यही हुआ ।
मैं समझी नहीं मेधावी ! तुम क्या कह रही हो ? मैने आज ऐसा क्या कहा ?
अरे पगली “हाय राम” का प्रयोग क्या कोई मुसलमान करता है ?
इतना सुन कर अमीना गुम सुम सी हो गयी । फिर थोडी देर बाद बोली – मेधावी तुम सच में मेधावी  ह़ो । तुम केवल नाम से ही मेधावी नहीं हो, बल्कि अक्ल से भी मेधावी हो । जो बात पिछले दस साल से कोई न जान सका, वह तुमने इतनी आसानी से जान ली ।
अमीना मैं तुम्हारी अच्छी सहेली हूँ । क्या अब भी तुम अपने दिल की बात नहीं बताओगी ?
मेधावी बताऊँगी ! तुम्हें तो जरूर बताऊँगी ।
इसके बाद, अमीना कहने लगी – मेधावी तेरी बात सच है कि मैं जन्म से मुसलमान नहीं हूँ । मैंने शादी के बाद ही इस्लाम धर्म कबूल किया । मैं तो माथुर परिवार से थी । हमारा मध्यंमवर्गीय परिवार था । मैं चार भाई बहनों में सबसे छोटी थी । परिवार में छोटी होने के कारण सबकी लाडली भी
 थी । लेकिन आज उन सब से दूर एक बेगानी सी पडी हूँ । मेरी जिंदगी में यह बदलाव तब आया
 जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज से बी. काम कर रही थी । उसी कालेज में साहिल के पापा भी पढते थे । एक दिन कालेज लायब्रेरी में उनसे मुलाकात क्या हुई कि फिर हम आये दिन मिलने लगे । यह सिलसिला इतना बढा कि आखिर हमने शादी करने का फैसला कर लिया ।
इसके बाद जो होना था, वही हुआ । शब्बीर का परिवार इसके लिए रजामंद न था । जहाँ तक मेरे माँ – बाप की बात है वे भी इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे । लेकिन हमारे बुलंद इरादों के आगे किसी की एक न चली ।
नतीजा यह हुआ कि शब्बीर के परिवार वालों ने तो हमारे रिश्ते को कबूल कर लिया । लेकिन मेरे माँ – बाप ने मुझ से अपना रिश्ता हमेशा – हमेशा के लिए तोड़ दिया । वो दिन है और आज का दिन है, उन्होंने पीछे मुडकर आजतक नहीं देखा कि मैं जिंदा हूँ या नहीं । रिश्ते टूटने की कसक क्या होती है,  वह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है । हम उनमे से हैं  जो आज भी उन रिश्तों को याद कर तडपते हैं ।
यह कह कर अमीना फफक – फफक रो पडी ।
मेधावी उसके आँसू पोंछने की कोशिश रही थी लेकिन आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे
थे ।