Friday, March 27, 2020
शिष्टाचार के संग्राम भीड़ तंत्र के बुद्धिजीवी तिकोना पार्क के बुद्धिजीवी मंच पर विचार मग्न थे। विमर्श का विषय था, शिष्टाचार के संग्राम। इस संबंध में सबसे पहले ज्ञान प्रकाश जी ने अपनी बात रखी जो इस प्रकार थी । देखिए, शिष्टाचार के संग्राम एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है जिस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिये। क्योंकि शिष्टाचार का सही पालन न होना भी, आये दिन नये नये किस्म के लड़ाई झगडों को जन्म देता है। सामान्य तौर पर शिष्टाचार के बारे में यही समझा जाता है कि बच्चे अपनों से बड़ों का सम्मान करें और बड़े अपनों से छोटों को स्नेह करें और उनका मार्गदर्शन करें । यह एक सामान्य समझ है । लेकिन साहब शिष्टाचार के बारे में समझने के लिए इतना ही जानना ही काफी नहीं है। अगर आप सरकारी एवं निजी सेवाओं पर नजर डालेंगे तो आप को इससे उलट देखने को मिलेगा। इन सेवाओं में उम्र व रिश्ते के आधार पर शिष्टाचार निभाने का चलन नहीं है। यहाँ पर तो कर्मचारियों के रैंक के आधार पर, कनिष्ठ अपने वरिष्ठ को सम्मान देते हैं और वरिष्ठ अपने कनिष्ठों का मार्गदर्शन करते हैं। इस आचारसंहिता का उल्लंघन करने पर कर्मचारी अनुशासन भंग का उत्तरदायी होता है । यह एक सामान्य नियम है । यहाँ पर भी सब ठीक नहीं चलता है । अपवाद के रूप में कनिष्ठ अपनी ऊंची पहुँच के बल पर अपने वरिष्ठ की अनदेखी करते हैं और वरिष्ठ अपनी र्दुभावना के चलते अपने कनिष्ठों का शोषण और दमन करते हैं । जो आये दिन, एक नए संग्राम को जन्म देते हैं। वैसे इस तरह की प्रवृतियों पर अंकुश लगाने के लिए, अनुशासन का डंडा, हमेशा शासन के पास रहता है। इसके अलावा, यह भी सुनने में आता है कि यहाँ पर भ्रष्टाचार भी एक शिष्टाचार के रुप में प्रतिष्ठित हो चुका है। घर परिवार में शिष्टाचार का आधार पारिवारिक रिश्ते हैं। जो अपने रिश्ते की हैसियत के अनुसार, व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। यानि कि जो रिश्ते में बडे समझे जाते हैं, वे सम्मान के अधिकारी है जो नहीं हैं वे स्नेह के पात्र हैं । लेकिन यहाँ पर भी सब कुछ ठीक नहीं रहता है। जो कमाते हैं वे सब पर हुक्म चलाते हैं। इसमें बडे - छोटे का कोई ख्याल नहीं रहता। इससे, सबसे ज्यादा आहत, वरिष्ठ नागरिक होते हैं। जो कभी, पहले इस घर के मुखिया थे। इस के अलावा जिस घर में एक से ज्यादा कमाने वाले हैं ,वहां घर में अपने वर्चस्व को लेकर को लेकर संघर्ष देखने को मिलता है । यह संघर्ष नित नये नये संग्रामों को जन्म देता रहता है। जैसा कि हम जानते हैं कि, परिवार भी समाज का अभिन्न अंग होने के नाते, अनेक सामाजिक संबंधों से जुडा होता है । यानि कि, अन्य अनेक परिवार, परिवार विशेष से जुडे होते हैं। लेकिन इन सामाजिक संबंधों में भी पारिवारिक संपन्नता और विपन्नता की झलक साफ दिखाई देती है। यह आर्थिक अंतर हमारे, सामाजिक संबंधों में विष घोलते रहते हैं। यानि कि, सामाजिक संबंध भी आर्थिक संपन्नता और विपन्नता के आधार पर वरीयता प्राप्त करते हैं। यह स्थिति भी शिष्टाचार के तानेबानेको अस्तव्यस्त करने में अपनी एक अहम भूमिका निभाती है तथा शिष्टाचार के नये -नये किस्म के संग्राम को जन्म देती हैं। इसके अलावा ऐसा भी देखने में आया है कि नये रिश्ते पुराने रिश्तों पर भारी पडते हैं। अर्थात नये रिश्ते, पुराने रिश्तों से अधिक वरीयता पाते हैं। जो कि शिष्टाचार के एक नये किस्म के संग्राम को जन्म देते हैं। राजनीति और व्यापार के अपने जटिल शिष्टाचार हैं । जो मूलत: लाभ हानि के गणित से संचालित होते है। उन पर भी चर्चा करेंगे तो विषय और भी जटिल तथा बोझिल हो जायेगा। वैसे शिष्टाचार के संग्राम यहाँ पर भी हैं। वक्तव्य समाप्त होने पर, पर गुप्ता जी ने पूछा, ज्ञान प्रकाश जी, यह जो आपने वस्तु स्थित बतायी है । वह तो एक ऐसी सच्चाई है जो हमारे घर परिवार का नाक में दम किये हुए हैं। क्या इस स्थिति में बेहतर कल की कोई संभावना है? बिल्कुल है, इसके लिए हमें शिष्टाचार के संग्राम के कारणों को ढूंढना होगा, तथा उनका वैज्ञानिक समाधान निकालना होगा। यह काम व्यापक सांस्कृतिक आन्दोलन के बिना संभव नहीं है।आम मेहनतकश की सोच को बदलना होगा। व्यक्ति - अहंकार, "बाप बड़ा न भईया, सबसे बड़ा रुपईया " की विनाशकारी सोच को दफनाना होगा और नये जीवन मूल्यबोधों, उच्च नीति नैतिकता आधारित संस्कृति को अपनाना होगा। इस प्रकार एक नये इंसान का निर्माण करते हुए एक नये जीवन आदर्श को अपनाना होगा। जो मानव द्वारा मानव के शोषण से मुक्ति दिलाने के संघर्ष में आम मेहनतकश जनता के लिए मार्ग-दर्शक माडल के रूप में काम करेगा। आप के विचार में, व्यक्ति का आत्मकेंद्रित चिन्तनयानि कि अपने काम से काम रखने की मानसिकता या यों कहें," मेरा काम सीधा भाड में जाय मजीदा" वाली सोच की क्या भूमिका है? देखिए, यह घोर व्यक्तिवादी एवं समाज विरोधी सोच है तथा संकटग्रस्त पूंजीवाद की प्रति छाया है,। ऐसा नहीं है कि व्यक्तिवाद हमेशा से ही ऐसा रहा है । एक समय यह उभरते हुए पूंजीवाद का सैद्धान्तिक संबल था जिसने नये प्रगतिशील जीवन मूल्य बोधों, जैसे सत्ता का विकेन्द्रीकरण, व्यक्ति स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, आदि सिद्धांतों का सूत्रपात किया था। जिसने मानव सभ्यता के विकास में असीम योगदान दिया है। लेकिन अब जब पूंजीवाद घनघोर बाजार संकट से जूझते हुए मोरीबन्द हो गया है । ऐसी स्थित में आज का व्यक्तिवाद सामूहिक सोच तथा सामूहिक हित के विरुद्ध कार्य करने को विवश है। अत: ऐसी सोच का परित्याग करना ही उचित है क्योंकि यह अंततः व्यक्ति को अकेलेपन की ओर धकेलती है। जिसका परिणाम यह होता है कि वह अवसाद का शिकार हो जाता है। समय की पुकार है कि हम व्यक्ति,समाज की प्रगति के लिए वैज्ञानिक,धर्मनिरपेक्ष एवं सामूहिक सोच को अपने जीवन में लागू करें और व्यक्ति समाज की प्रगति में अपनी भागेदारी सुनिश्चित करें ।
Subscribe to:
Posts (Atom)